
डॉ. ओम प्रकाश से एक विस्तृत साहित्यिक संवाद
संजय द्विवेदी
प्रश्न 1.
सबसे पहले आपको “विदा होती बेटियाँ” जैसे अत्यंत संवेदनशील काव्य-संग्रह के लिए हार्दिक बधाई। आप अपने रचनात्मक व्यक्तित्व और इस संग्रह की मूल प्रेरणा के बारे में क्या कहना चाहेंगे?
उत्तर :
बहुत धन्यवाद। मेरे लिए कविता कोई साहित्यिक महत्वाकांक्षा का माध्यम नहीं रही, बल्कि जीवन को समझने और उसे बचाए रखने का एक आंतरिक उपक्रम रही है। “विदा होती बेटियाँ” भी उसी संवेदनात्मक यात्रा का परिणाम है। यह संग्रह अचानक नहीं लिखा गया, बल्कि वर्षों तक जीवन को देखते, महसूस करते और भीतर जमा होते अनुभवों से धीरे-धीरे आकार लेता गया।
मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि ग्रामीण भारतीय जीवन से जुड़ी रही है। भोजपुरी भाषिक परिवेश, माता-पिता का संघर्ष, गाँव की सामूहिकता, रिश्तों की आत्मीयता, विस्थापन का दर्द—इन सबने मेरे भीतर संवेदना का एक संसार निर्मित किया। जब मैंने देखा कि आधुनिक समय में मनुष्य धीरे-धीरे संवेदनहीन होता जा रहा है, रिश्ते औपचारिक हो रहे हैं, तब लगा कि कविता के माध्यम से मनुष्यता की बची हुई ऊष्मा को बचाने की कोशिश की जानी चाहिए।
“विदा होती बेटियाँ” केवल बेटियों की विदाई का आख्यान नहीं है, बल्कि यह उस समूची मानवीय दुनिया की कथा है, जहाँ प्रेम, करुणा, स्मृति, अकेलापन, विस्थापन और उम्मीद एक साथ मौजूद हैं।
प्रश्न 2.
शीर्षक कविता “विदा होती बेटियाँ” अत्यंत मार्मिक है। इस कविता की रचना-प्रक्रिया और भावभूमि के बारे में बताइए।
उत्तर :
भारतीय समाज में बेटी की विदाई केवल एक पारिवारिक घटना नहीं होती; वह पूरे घर की आत्मा को प्रभावित करती है। मैंने अपने आसपास अनेक परिवारों में यह देखा कि बेटी के जाने के बाद घर का वातावरण बदल जाता है। वही आँगन, वही दीवारें, वही वस्तुएँ—सब कुछ जैसे चुप हो जाता है।
यह कविता उसी अनुभूति से निकली। लेकिन मैं केवल भावुकता तक सीमित नहीं रहना चाहता था। मैं यह भी देख रहा था कि बेटियाँ अपने सपनों, इच्छाओं और अस्तित्व के साथ किस प्रकार सामाजिक संरचनाओं में समायोजित होने को विवश होती हैं। इसलिए कविता में यह पंक्ति आई—
“विदा होती बेटियाँ
कभी-कभी
हमेशा के लिए भी
विदा हो जाती हैं।”
यहाँ ‘हमेशा के लिए’ केवल मृत्यु का संकेत नहीं है; यह उस भावनात्मक दूरी, सामाजिक दबाव और अस्तित्वगत विछोह की ओर भी संकेत करता है, जिसे अनेक स्त्रियाँ जीवन भर झेलती हैं।
प्रश्न 3.
आपकी कविताओं में माता-पिता विशेष रूप से उपस्थित हैं। “माँ का अकेलापन”, “पिता के सपने”, “माता-पिता” जैसी कविताएँ पाठक को भीतर तक स्पर्श करती हैं। यह भावभूमि कहाँ से आती है?
उत्तर :
मुझे लगता है कि मनुष्य की संवेदना की पहली पाठशाला उसका परिवार होता है। मैंने अपने माता-पिता को बहुत संघर्ष करते देखा है। पिता का अनुशासन, त्याग और भीतर छिपी करुणा; माँ का निस्वार्थ प्रेम, प्रतीक्षा और मौन पीड़ा—ये सब मेरे भीतर गहरे अंकित हैं।
आज का समय तेज़ी से बदल रहा है। परिवार छोटे हो रहे हैं, रिश्तों में संवाद कम हो रहा है, वृद्ध माता-पिता अकेले होते जा रहे हैं। “माँ का अकेलापन” इसी यथार्थ से निकली कविता है।
“भीड़ भरे शहर में
अकेली हूँ मैं…”
यह केवल एक माँ की आवाज़ नहीं है; यह उस पूरी पीढ़ी की आवाज़ है, जिसे आधुनिकता ने सुविधाएँ तो दीं, पर आत्मीयता छीन ली।
इसी प्रकार “पिता के सपने” में मैंने पिता को किसी आदर्श प्रतिमा की तरह नहीं, बल्कि संघर्षरत मनुष्य की तरह देखा है। मुझे लगता है कि हिंदी कविता में पिता पर जितनी गहराई से लिखा जाना चाहिए था, उतना नहीं लिखा गया। मैं उस रिक्ति को भरना चाहता था।
प्रश्न 4.
आपकी कविताओं में प्रेम भी है, लेकिन वह पारंपरिक रोमानी प्रेम नहीं लगता। आपका प्रेम-दर्शन क्या है?
उत्तर :
मेरे लिए प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच का आकर्षण नहीं है। प्रेम मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने वाली शक्ति है। अगर प्रेम नहीं बचेगा, तो संवेदना नहीं बचेगी, और संवेदना नहीं बचेगी तो सभ्यता केवल तकनीक और बाज़ार में बदल जाएगी।
मेरी कविताओं में प्रेम निजी से सामाजिक की ओर जाता है। “प्रेम”, “प्रेम-पत्र”, “प्रेम करता हूँ मैं” जैसी कविताओं में प्रेम आत्मिक अनुभव है—
“तुमसे मिलकर मैं
मनुष्य होने लगता हूँ।”
मेरे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण पंक्ति है। प्रेम हमें बेहतर मनुष्य बनाता है।
प्रश्न 5.
आपकी कविताओं में सामाजिक और राजनीतिक चेतना भी दिखाई देती है—विशेषकर “शब्द”, “आत्महंता”, “भूख”, “मज़दूर” जैसी कविताओं में। क्या आप स्वयं को प्रतिरोध का कवि मानते हैं?
उत्तर :
अगर प्रतिरोध का अर्थ मनुष्यता-विरोधी शक्तियों के विरुद्ध खड़ा होना है, तो निश्चित रूप से मैं प्रतिरोध का कवि हूँ। लेकिन मेरा प्रतिरोध नारेबाज़ी वाला नहीं है। मैं मानता हूँ कि कविता का सबसे बड़ा काम मनुष्य के भीतर संवेदना को बचाए रखना है।
“शब्द” कविता में मैंने देखा कि शब्द कैसे अपने अर्थ खोते जा रहे हैं। भाषा बाज़ार और सत्ता के प्रभाव में बदल रही है—
“शब्द
हथियार बन गए हैं।”
इसी तरह “आत्महंता” कविता में मैंने उस व्यक्ति की त्रासदी को व्यक्त किया है, जो अपने आदर्शों से समझौता कर लेता है। यह केवल किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि हमारे समय की नैतिक विडंबना है।
प्रश्न 6.
आपकी कविताओं में गाँव और शहर का द्वंद्व बार-बार दिखाई देता है। “शहर” कविता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। क्या यह आपका निजी अनुभव है?
उत्तर :
हाँ, बहुत हद तक। मैं गाँव से शहर आया, फिर महानगरों में रहा। मैंने देखा कि शहर मनुष्य को अवसर तो देता है, लेकिन धीरे-धीरे उससे उसकी आत्मीयता छीन लेता है।
“शहर” कविता में यही अकेलापन है—
“थोड़ी सी दूरी बना कर रखी है
मैंने ख़ुद से भी…”
यह आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी है कि वह स्वयं से भी दूर होता जा रहा है।
प्रश्न 7.
आपकी भाषा अत्यंत सरल है, लेकिन उसमें गहरी संवेदनात्मक शक्ति है। क्या यह आपकी सजग काव्य-रणनीति है?
उत्तर :
मैं मानता हूँ कि कविता की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो पाठक के हृदय तक पहुँचे। जटिलता केवल बौद्धिक प्रदर्शन के लिए नहीं होनी चाहिए। मेरी भाषा लोक-संवेदना से आती है। भोजपुरी, ग्रामीण संस्कृति और आम जीवन की बोलचाल ने मेरी भाषा को आकार दिया।
मैं चाहता हूँ कि मेरी कविता पढ़ते हुए पाठक को लगे कि यह उसकी अपनी बात है।
प्रश्न 8.
समकालीन हिंदी कविता में आप “विदा होती बेटियाँ” को कहाँ स्थित मानते हैं?
उत्तर :
मैं अपनी कविता को किसी खेमे या वाद में बाँधकर नहीं देखता। लेकिन इतना ज़रूर मानता हूँ कि आज की कविता को मनुष्य की तरफ़ लौटना होगा। तकनीक, राजनीति और बाज़ार के इस समय में संवेदना सबसे अधिक संकट में है।
“विदा होती बेटियाँ” उसी संकट के बीच मनुष्यता की खोज है। अगर यह संग्रह पाठक को अपने माता-पिता, बेटियों, प्रेम और समाज के बारे में नए ढंग से सोचने के लिए प्रेरित करता है, तो मैं समझूँगा कि मेरी कविता सार्थक हुई।
प्रश्न 9.
आपकी दृष्टि में कविता का अंतिम उद्देश्य क्या है?
उत्तर :
कविता का अंतिम उद्देश्य मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना है। कविता हमें हमारे भीतर छिपी करुणा, प्रेम और नैतिकता से जोड़ती है।
मैंने अपनी एक कविता में लिखा है—
“सबसे कठिन है
कठोर वक़्त में
ख़ुद को सरल बनाए रखना।”
मुझे लगता है, यही कविता का भी उद्देश्य है—मनुष्य को कठोर समय में भी मनुष्य बनाए रखना।
प्रश्न 10.
युवा पाठकों के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर :
मैं केवल इतना कहना चाहूँगा कि साहित्य को केवल पाठ्य-वस्तु की तरह न पढ़ें। उसे जीवन की तरह पढ़ें। कविता तब सबसे अधिक अर्थवान होती है, जब वह आपके भीतर किसी भूले हुए मनुष्य को जगा दे।
आज के समय में संवेदना बचाना सबसे बड़ा प्रतिरोध है। अगर मेरी कविताएँ पाठकों के भीतर प्रेम, करुणा और आत्मचिंतन की थोड़ी-सी जगह बना पाती हैं, तो यही मेरे लेखन का सबसे बड़ा पुरस्कार होगा।
प्रश्न 11.
आपकी कविताओं में बार-बार स्मृति लौटती है—गाँव, माँ, पिता, घर, आँगन, बेटियाँ, पुरानी आवाज़ें। क्या आपके लिए स्मृति केवल अतीत है या प्रतिरोध का माध्यम भी?
उत्तर :
मेरे लिए स्मृति केवल बीते समय का संग्रह नहीं है। स्मृति मनुष्य की आत्मा को बचाए रखने की प्रक्रिया है। आज का समय बहुत तेज़ी से मनुष्य को उसकी जड़ों से काट रहा है। बाज़ार चाहता है कि हम केवल उपभोक्ता बनें, स्मृतिहीन हों, ताकि हमें आसानी से नियंत्रित किया जा सके।
ऐसे समय में गाँव की याद, माँ की थपकी, पिता की आवाज़, घर का आँगन—ये सब केवल भावुक प्रसंग नहीं रह जाते; ये मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने वाले तत्व बन जाते हैं।
“शहर” कविता में जो घर लौटने की बेचैनी है, वह केवल भौगोलिक वापसी नहीं है; वह अपने मूल, अपनी आत्मा और अपने भीतर बची हुई मनुष्यता की ओर लौटने की इच्छा है।
प्रश्न 12.
आपकी कविताओं में ‘घर’ एक स्थायी प्रतीक की तरह उपस्थित है। क्या यह घर वास्तविक है या मनुष्य के भीतर का कोई भावलोक?
उत्तर :
बहुत सुंदर प्रश्न है। मेरे लिए ‘घर’ केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं है। घर एक भावनात्मक और नैतिक स्थान है, जहाँ मनुष्य बिना भय, बिना मुखौटे और बिना प्रतिस्पर्धा के स्वयं हो सकता है।
आज आधुनिक जीवन में सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मनुष्य के पास मकान हैं, लेकिन घर कम होते जा रहे हैं।
“उम्मीद है
एक दिन पहुँच पाऊँगा
अपने घर…”
यहाँ घर किसी एक जगह का नाम नहीं है; यह आत्मीयता, शांति और स्वीकृति का प्रतीक है।
प्रश्न 13.
आपकी कविताओं में स्त्री केवल पीड़ा की प्रतीक नहीं, बल्कि प्रतिरोध और चेतना का स्वर भी है। क्या यह दृष्टि सजग रूप से विकसित हुई?
उत्तर :
मैंने अपने जीवन में स्त्रियों को केवल पारिवारिक भूमिकाओं में नहीं देखा, बल्कि संघर्ष करते हुए देखा है। मेरी माँ, बहन, पत्नी, बेटियाँ—इन सभी ने मुझे यह सिखाया कि स्त्री केवल संवेदना नहीं, शक्ति भी है।
“अपाहिज मानसिकता” जैसी कविता लिखते समय मेरे भीतर बहुत आक्रोश था। मैं देख रहा था कि समाज स्त्री को आज भी एक स्वतंत्र मनुष्य की तरह स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
लेकिन मैं स्त्री को केवल पीड़ित रूप में चित्रित नहीं करना चाहता था। “विदा होती बेटियाँ” में बेटियाँ टूटती नहीं हैं; वे स्मृतियों, संबंधों और प्रेम को बचाकर रखती हैं। वे जीवन को जोड़ने वाली शक्ति हैं।
प्रश्न 14.
आपकी कविताओं में ‘अँधेरा’ और ‘प्रकाश’ बार-बार आते हैं। क्या यह केवल प्रतीकात्मक प्रयोग है या इसके पीछे कोई गहरा दार्शनिक अर्थ भी है?
उत्तर :
मेरी कविताओं में अँधेरा केवल निराशा का प्रतीक नहीं है। अँधेरा वह समय भी है, जब मनुष्य अपनी आत्मा से दूर हो जाता है। और प्रकाश केवल बाहरी रोशनी नहीं, बल्कि भीतर की नैतिक चेतना है।
“हे प्रभु” कविता में मैंने लिखा—
“अँधेरे को
उजाला साबित करने के गुनाह से
बचा सकूँ ख़ुद को।”
यह पंक्ति मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। आज का समय भ्रम पैदा करता है। झूठ को सच की तरह प्रस्तुत किया जाता है। ऐसे समय में सत्य को पहचानना और उसे स्वीकार करना ही प्रकाश है।
प्रश्न 15.
“शब्द” कविता में भाषा के संकट की जो चिंता दिखाई देती है, वह समकालीन कविता के लिए कितना महत्वपूर्ण प्रश्न है?
उत्तर :
बहुत महत्वपूर्ण। आज भाषा सबसे अधिक संकट में है। शब्द अपने अर्थ खो रहे हैं। राजनीति, बाज़ार और मीडिया ने शब्दों को उपभोग की वस्तु बना दिया है।
“शब्द
बिकाऊ हो गए हैं…”
यह केवल काव्यात्मक पंक्ति नहीं, हमारे समय का यथार्थ है।
कविता का दायित्व है कि वह शब्दों की गरिमा बचाए। अगर शब्द बचेंगे नहीं, तो विचार नहीं बचेंगे; विचार नहीं बचेंगे, तो मनुष्य भी भीतर से रिक्त हो जाएगा।
प्रश्न 16.
आपकी कविता में बार-बार ‘साधारण मनुष्य’ दिखाई देता है—मज़दूर, माँ, पिता, बेटियाँ, अकेला आदमी। क्या यह आपकी वैचारिक प्रतिबद्धता है?
उत्तर :
हाँ। मैं मानता हूँ कि कविता का केंद्र वही मनुष्य होना चाहिए, जो जीवन की असली लड़ाइयाँ लड़ रहा है।
मुझे हमेशा लगता रहा कि बड़े विमर्शों और चमकदार शब्दों के बीच साधारण मनुष्य छूटता जा रहा है। मेरी कविता उसी छूटते हुए मनुष्य को आवाज़ देने की कोशिश है।
“मैं ही अनसुना रह जाता हूँ संसद में…”
यह पंक्ति केवल मजदूर की नहीं, उस हर व्यक्ति की आवाज़ है जिसे व्यवस्था सुनना नहीं चाहती।
प्रश्न 17.
आपकी कई कविताएँ अस्तित्ववादी बेचैनी से भरी हुई लगती हैं—जैसे मनुष्य स्वयं को बचाने की लड़ाई लड़ रहा हो। क्या आपने अस्तित्ववादी दर्शन पढ़ा है?
उत्तर :
मैंने दार्शनिक रूप से अस्तित्ववाद का अध्ययन किया है, लेकिन उससे पहले मैंने जीवन को महसूस किया है। मुझे लगता है कि हर संवेदनशील मनुष्य अपने समय में अस्तित्वगत संकट से गुजरता है।
“आत्महंता” कविता उसी संकट की कविता है। जब मनुष्य अपने ही आदर्शों से समझौता करता है, तब भीतर एक मृत्यु घटती है।
मेरी कविता का संघर्ष यही है कि मनुष्य भीतर से पूरी तरह न मरे।
प्रश्न 18.
आपकी कविता में प्रेम और प्रतिरोध साथ-साथ चलते हैं। क्या यह जानबूझकर है?
उत्तर :
हाँ, क्योंकि मेरे लिए प्रेम सबसे बड़ा प्रतिरोध है। नफ़रत के इस समय में प्रेम करना आसान नहीं है।
“मैं मुहब्बत कर सकूँ
हज़ार नफ़रतों के बाद भी…”
यह पंक्ति केवल व्यक्तिगत प्रेम की नहीं है; यह मनुष्यता को बचाए रखने की जिद है।
अगर प्रेम समाप्त हो जाएगा, तो प्रतिरोध भी क्रूरता में बदल जाएगा। इसलिए प्रेम आवश्यक है।
प्रश्न 19.
क्या आपको लगता है कि “विदा होती बेटियाँ” समकालीन हिंदी कविता में कोई नया प्रतिमान प्रस्तुत करती है?
उत्तर :
यह कहना पाठकों और आलोचकों का काम है, लेकिन इतना अवश्य कहूँगा कि मैंने कविता को जीवन से अलग नहीं देखा।
मैंने बेटियों को केवल करुणा का विषय नहीं बनाया; उन्हें स्मृति, संबंध, प्रतिरोध और अस्तित्व की केंद्रीय शक्ति की तरह देखा।
इसी प्रकार पिता, माँ, मजदूर, प्रेम—इन सबको मैंने किसी विचारधारात्मक टेम्पलेट में नहीं, बल्कि जीवन के भीतर से समझने की कोशिश की।
अगर यह दृष्टि पाठकों को नया अनुभव देती है, तो शायद यही इस संग्रह की उपलब्धि होगी।
प्रश्न 20.
“विदा होती बेटियाँ” आपके लिए क्या है? एक काव्य-संग्रह, आत्मकथा, प्रतिरोध या प्रार्थना?
उत्तर :
शायद यह इन सबका सम्मिलित रूप है।
यह मेरे समय के प्रति मेरी बेचैनी भी है, अपने लोगों के प्रति प्रेम भी, भीतर के अकेलेपन का स्वीकार भी, और मनुष्यता को बचाए रखने की प्रार्थना भी।
अगर एक पंक्ति में कहूँ तो—
“विदा होती बेटियाँ” मेरे लिए मनुष्य बने रहने की कोशिश का दस्तावेज़ है।
प्रश्न :21
आपकी कविता में लोक-संवेदना और आधुनिक बौद्धिकता साथ-साथ चलती है। क्या आप स्वयं को किसी विशिष्ट काव्य-परंपरा से जुड़ा हुआ मानते हैं?
उत्तर :
मेरी संवेदना का मूल लोक जीवन में है, लेकिन मेरी वैचारिक निर्मिति आधुनिक हिंदी साहित्य और विश्वविद्यालयीय चिंतन से हुई। मुझे लगता है कि कविता को अपनी जड़ों से जुड़े रहकर ही आधुनिक होना चाहिए।
फणीश्वरनाथ रेणु की आंचलिक संवेदना, नागार्जुन की जनपक्षधरता, केदारनाथ सिंह की आत्मीय भाषा, धूमिल का प्रश्नाकुल यथार्थ और मुक्तिबोध की नैतिक बेचैनी—इन सबने कहीं-न-कहीं मुझे प्रभावित किया है।
प्रश्न :22
राजभाषा हिंदी और प्रशासनिक तंत्र से जुड़े रहने का आपकी कविता पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर :
प्रशासनिक जीवन ने मुझे मनुष्य और व्यवस्था के बीच की दूरी को बहुत करीब से देखने का अवसर दिया। मैंने देखा कि फाइलों के भीतर भी मनुष्यों के जीवन छिपे होते हैं।
राजभाषा के क्षेत्र में काम करते हुए भाषा की शक्ति और उसके संकट दोनों को समझा। शायद यही कारण है कि “शब्द” जैसी कविताएँ लिखी जा सकीं।
प्रश्न :23
क्या आपको लगता है कि आज की कविता में संवेदना का क्षरण हुआ है?
उत्तर :
कुछ हद तक। आज कविता में शिल्प और विमर्श तो बहुत हैं, लेकिन मनुष्य कम होता जा रहा है। मुझे लगता है कि कविता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवेदनात्मक ईमानदारी होती है।
अगर कविता मनुष्य के दुख, प्रेम, अकेलेपन और संघर्ष को नहीं छूती, तो वह केवल बौद्धिक अभ्यास बनकर रह जाती है।
प्रश्न :24
आपकी आगामी साहित्यिक योजनाएँ क्या हैं?
उत्तर :
मैं अभी भी जीवन को समझने की प्रक्रिया में हूँ। लिखना मेरे लिए स्वयं को बचाए रखने जैसा है। आगे भी मनुष्य, स्मृति, भाषा, प्रेम और सामाजिक विडंबनाओं पर लिखना चाहता हूँ।
SNC Urjanchal News Hindi News & Information Portal