नींव के पत्थरों का महत्व भवन से कम नहीं !

  • स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ और पँडित दूधनाथ पांडेय

विजय शंकर चतुर्वेदी की रिपोर्ट

जब स्वतंत्रता आंदोलन की आग धधक रही थी, आंदोलनकारी सिर पर कफ़न बांध कर सर्वस्व अर्पित करने के लिए तैयार थे, वहीं कुछ नवयुवक ऐसे थे जो सेनानियों की योजनाओं पर कुछ भी करने को तैयार थे । ऐसा ही एक व्यक्तित्व था पँडित दूधनाथ पांडेय का , जो स्वतंत्रता सेनानी तो नहीं रहे, लेकिन आज़ादी की आग में वे झुलसने के लिए सदैव तैयार रहे ।
राबर्ट्सगंज से दस किलोमीटर दूर एक गांव है देवरी कला, जहां पँडित भीष्मराम पांडेय का नवयुवक बेटे दूधनाथ पांडेय के मन मस्तिष्क में उथल पुथल चल रही थी, अंग्रेजों का जुल्म वह देख नहीं पाते थे , स्वयं कुछ न कर पाने का मलाल उन्हें सोने नहीं देता था । नवयुवक दूधनाथ एक दिन आज़ादी के महानायक , अविभाजित मिर्जापुर में आंदोलन की अलख जगा रहे क्रांतिकारी पँडित महादेव चौबे के पास पहुंच गए, चौबे जी ने कार्यस्थली परासी दुबे के उस बगीचे को बना रखा था जो वर्तमान का शहीद उद्यान है।
गुलाम भारत में समाचारों का प्रेषण, क्रांतिकारी लेखों का प्रकाशन व उसका प्रचार प्रसार सभी प्रतिबंधित था । स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक पँडित महादेव चौबे परासी की वाटिका जहां से उस समय आंदोलन की रणनीति बनती थी , वहीं से एक समाचार पत्र ‘ परिवर्तन’ का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ । दूधनाथ पांडेय को चौबे जी ने उन्हें कम्पोजिंग सीखने की सलाह दी । वे दस किलोमीटर साइकिल से जाकर राबर्ट्सगंज के एक प्रिंटिंग प्रेस में कम्पोजिंग का कार्य सीखने लगे , सीखने के बाद उन्होंने चौबे जी को बताया , चौबे जी ने उनके उत्साह को देखकर काम करने की इजाज़त दे दी।
काम और भी कठिन था, अंग्रेज सिपाही घूमते रहते थे, इसलिए उन्होंने रात में कम्पोजिंग करना प्रारम्भ किया और अखबार रात में ही छपकर बंट जाया करता था। वे रात में साइकिल से जाकर राबर्ट्सगंज नगर में कुछ चुने हुए लोगों के बीच अखबार वितरित कर दिया करते थे,
दूधनाथ जी के योगदान को कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता । सेनानी तो गिने चुने हैं लेकिन देशप्रेम का जज्बा लेकर जिन लोगों ने सेनानियों का सहयोग किया उनका योगदान भी स्तुत्य है।

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