जानिये आचार्य वीर विक्रम नारायण पांडेय से भगवान शिव का हरिहरात्मक रूप

धर्म डेस्क जानिये आचार्य वीर विक्रम नारायण पांडेय से भगवान शिव का हरिहरात्मक रूप

एक बार सभी देवता भगवान विष्णु के पास गये और उन्हें नमस्कार करने के बाद संपूर्ण जगत के अशांत होने का कारण पूछा । देवताओं के प्रश्न करने पर भगवान विष्णु ने कहा – ‘देवताओं ! हम तुम्हारे इस प्रश्न का यथोचित उत्तर नहीं दे सकते । हम सभी लोगों को एक साथ मिलकर भगवान शंकर के पास चलना चाहिए । वे महान ज्ञानी हैं । संपूर्ण सृष्टि में होने वाली किसी भी क्रिया से वे अपरिचित नहीं हैं । इस चराचर जगत की व्याकुलता का कारण वे ही जानते होंगे ।’ भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर इंद्रादि समस्त देवगण जनार्दन को आगे करके पर्वत पर गये । वहां जाने पर बहुत प्रयास करने के बाद भी उन्हें कहीं भी महादेव के दर्शन नहीं हुए । अज्ञान के अंधकार में पड़े हुए देवताओं ने भगवान विष्णु से महादेव का दर्शन न होने का कारण पूछा । इस पर भगवान विष्णु ने कहा – ‘क्या आप लोग अपने सामने स्थित महादेव को नहीं देख रहे हैं ।’

देवताओं ने उत्तर दिया – ‘हां, हमलोग गिरिजापति देवेश को नहीं देख रहे हैं । हमलोग उस कारण को नहीं जानते, जिससे हमारी देखने की शक्ति नष्ट हो गयी है ।’

भगवान विष्णु ने कहा – ‘देवताओं ! आप लोगों ने महादेव का अपराध किया है । आप लोग पार्वती जी का गर्भ नष्ट करने के कारण महापाप से ग्रस्त हो गये हैं । इसलिए शूलपाणि भगवान महादेव ने आप लोगों के सम्यक अवबोध और विचारशक्ति को नष्ट कर दिया है । इस कारण आप सब सामने स्थित शंकर को देखकर भी नहीं देख रहे हैं । अत: आप सब अब महादेव के दर्शन की योग्यता प्राप्त करने के लिए तप्तकृच्छ्र – व्रतद्वारा पावन होकर स्नान करें । उसके बाद आपलोग भगवान शंकर का सविधि अभिषेक करें । नाना प्रकार के उपचारों से भगवान शिव की पूजा करें । देवताओं ! तामकृच्छ्र – व्रत का विधान यह है कि तीन दिन बारह पल गरम जल पीएं, तीन दिन आठ पल गरम दूध पीएं, तीन दिन छ: पल गरम घी पीएं और तीन दिन केवल वायु पीकर रहे ।’

भगवान विष्णु के इस प्रकार कहने पर इंद्रादि देवताओं ने अपनी शुद्धि के लिए एकांत में तप्तकृच्छ्र – व्रत का अनुष्ठान किया, जिसके प्रभाव से वे पापमुक्त हो गये । पाप से छूटकर देवताओं ने भगवान विष्णु से कहा – ‘जगन्नाथ ! अब आप हमें भगवान शंभु का दर्शन करायें, जिससे हम उनका अभिषेक कर सकें ।’ देवताओं की बात सुनकर मुरारि विष्णु ने उन्हें अपने हृदयकमल में विश्राम करने वाले भगवान शंकर के लिंग का दर्शन करा दिया । उसके बाद देवताओं ने दुग्धादि से उस अक्षय लिंग को स्नान कराया । फिर उन लोगों ने गोरोचन और सुगंधित चंद का लेपन कर विल्वपत्रों और कमलों से भक्तिपूर्वक महादेव की पूजा की । उसके बाद उन्होंने भगवान शिव के एक सौ आठ नामों का जप करके उन्हें प्रणाम किया ।

सभी देवता यह विचार करने लगे कि सत्त्वगुण की अधिकता से भगवान विष्णु और तमोगुण की प्रधानता से प्रादुर्भूत भगवान शिव में एकता किस प्रकार हुई ? देवताओं के इस विचार को जानकर भगवान ने उन्हें अपने हरिहरात्मक रूप का दर्शन कराया । देवताओं ने एक ही शरीर में कान में सर्पों के कुण्डल पहने, सिर पर लंबे बाल के जटाजूट बांधे, गले में सर्पों की माला धारण किये, हाथ में पिनाक, शूल, आजगव धनुष धारण किए । बाघंबर धारण करने वाले, त्रिनेत्रधारी वृषध्वज महादेवी साथ कुण्डलधारी, गरुड़ध्वज, हार और पीतांबर पहने, हाथों में चक्र, असि, शंख लिए भगवान विष्णु को देखा । इस प्रकार ब्रह्मा आदि देवताओं ने हरि और हरको एक रूप समझकर उनकी स्तुति की ।

तदंतर देवों के स्वामी भगवान विष्णु देवताओं को समान हृदयवाला समझकर उनको साथ लेकर शीघ्र अपने आश्रम कुरुक्षेत्र गये । वहां उन लोगों ने जल के भीतर स्थाणुभूत महादेव को देखा । सभी लोगों ने ‘स्थाणवे नम:’ कहकर भगवान शिव को नमस्कार किया । उसके बाद इंद्र ने कहा – ‘अतिथि प्रिय जगन्नाथ ! जगत अशांत हो उठा है । आप बाहर निकलकर आइए और हमें वर दीजिए ।’ देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव बाहर आ गये ।

देवताओं ने उनसे कहा – ‘महादेव ! आप इस महाव्रत को शीघ्र छोड़ दीजिए । आप के तेज से व्याप्त होकर तीनों लोक क्षुब्ध हो गये हैं ।’ देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शंकर ने अपने महाव्रत को त्याग दिया । देवता स्वर्ग चले गये । पिर भी समुद्र और द्वीपों के साथ पृथ्वी का कांपना बंद नहीं हुआ । रुद्र ने सोचा कि मेरे तपस्या से विरत हो जाने के बाद भी पृथ्वी क्यों कांप रही है । फिर त्रिशूलधारी भगवान शिव कुरुक्षेत्र के चारों ओर विचरण करने लगे ।

उन्होंने ओघवती के किनारे तपस्यारत शुक्राचार्य को देखा । देवाधिदेव भगवान शिव ने उनसे कहा – ‘विप्र ! आप जगत के क्षुब्ध करने वाला तप क्यों कर रहे हैं ? उसे मुझे शीघ्र बताइए ।’

शुक्राचार्य ने कहा – ‘तपोधन ! मैं आपकी तपस्या से भली भांति प्रसन्न हूं । आप संजीवनी – विद्या को यथार्थ रूप से जान जाएंगे ।’ इस प्रकार वर प्राप्त कर शुक्राचार्य तपस्या से विरत हो गये । फिर भी सागर, पर्वत, वृक्षादि और पृथ्वी का कांपना बंद नहीं हुआ । उसके बाद महादेव सप्तसारस्वत में गये । वहां उन्होंने मङ्कण नाम के महर्षि को नाचते हुए देखा । वे बालक के समान भावविभोर होकर उछल – उछलकर नाच रहे थे । उसी के कारण पृथ्वी कांप रही थी । महादेव के कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि मुझे तपस्या करते हुए अनेक वर्ष बीत गये । अब मेरे हाथ से घाव के कारण शाकरस निकल रहा है । इससे मुझे प्रसन्नता हो रही है और मैं आनंद में विभोर होकर नाच रहा हूं ।’ भगवान शंकर ने उन्हें नाचने से मना करके वरदान दिया । इस प्रकार देवताओं को हरिहरात्मक शिव का दर्शन हुआ और शिव – कृपा से पृथ्वी का कांपना बंद हो जाने से जगत की व्याकुलता शांत हो गयी ।

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