रिपोर्टर पुरुषोत्तम चतुर्वेदी
वाराणसी। ब्रेथ ईजी के वरिष्ठ श्वांस, एलर्जी एवं टी.बी रोग विशेषज्ञ डॉ एस.के पाठक द्वारा मरीजों से एक परिचर्चा में बताया गया – “मौसम में बदलाव आते ही हवा में ठंडक, नमी और प्रदूषण के कणों का संतुलन बिगड़ने लगता है। यह समय सामान्य लोगों के लिए भले ही सुहावना हो, लेकिन अस्थमा (दमा), ब्रोंकाइटिस और सीओपीडी (COPD) जैसी सांस की बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए बेहद संवेदनशील होता है। तापमान में अचानक गिरावट, शुष्क हवा और सुबह की धुंध वायुमार्ग (एयरवे) को संकुचित कर देती है, जिससे सांस फूलना, लगातार खांसी और सीने में जकड़न जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ती हैं। बदलते मौसम में सांस की तकलीफ बढ़ने के मुख्य कारण तापमान में उतार-चढ़ाव गर्म से अचानक ठंडे वातावरण में जाने पर सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं, जिसे ‘ब्रोंकोस्पास्म’ कहते हैं। हवा में एलर्जेंस और स्मॉग मौसम बदलते समय हवा में परागकण (पॉलेन ग्रेंस), फंगस स्पोर्स और धूल-धुएं का स्तर बढ़ जाता है, जो फेफड़ों में सूजन पैदा करते हैं। वायरल संक्रमण: इस मौसम में सर्दी-जुकाम, फ्लू और अन्य वायरल इन्फेक्शन आसानी से फैलते हैं, जो सांस के पुराने मरीजों के लिए गंभीर ट्रिगर साबित होते हैं।
डॉ एस.के पाठक ने मरीजों के लिए जरूरी सावधानियां और बचाव के उपायों में जैसे तड़के सुबह और देर शाम की सैर से बचें, दवा और इनहेलर का नियमित उपयोग, ठंडी चीजों और खट्टे खाद्य पदार्थों से परहेज रखें, कमरे में धूल, सीलन या पालतू जानवरों के रोएं जमा न होने दें। घर में झाड़ू लगाने के बजाय गीला पोंछा लगाएं ताकि धूल हवा में न उड़े। दिन में एक से दो बार सादे पानी की भाप लें। इससे सांस की नलियों में जमा कफ ढीला होकर आसानी से बाहर निकल जाता है।“ गरम कपड़े एवं कंबल रजाई आदि को सेवन करने से पहले अच्छी तरह से झाड़ ले, धूप दिखा ले नहीं तो सांस के अटैक होने की संभावना हो सकती है। आपातकालीन के समय यदि इनहेलर लेने के बाद भी सांस लेने में आराम न मिले, सीने में तेज दर्द या घरघराहट बनी रहे, होंठ या नाखूनों का रंग नीला पड़ने लगे, अथवा बोलने में सांस टूटने लगे, तो बिना किसी देरी के निकटतम अस्पताल या ब्रेथ ईज़ी चेस्ट स्पेशलिस्ट से संपर्क करें।
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