भारतीय संस्कृति के परम उपासक थे डा. हेडगेवार

सोनभद्र- सर्वेश श्रीवास्तव

प्रस्तुति भोलानाथ मिश्र

21 जून 2021 को 81 साल हो गए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सर संघचालक डा. केशव बलिराम हेडगेवार के शरीर को पंचतत्व में विलीन हुए। विचार परिवार का राजनीतिक संगठन बीजेपी की केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दूसरी बार सरकार बनी और 2024 के लिए सभी राजनीतिक दलों के सामने एक बड़ी चुनौती भी रहेगी। उत्तर प्रदेश में योगी के नेतृत्व में 2022 विंधानसभा चुनाव में भी प्रतिपक्ष के समक्ष

एक कठिन परीक्षा रहेगी बावजूद इसके स्वाधीनता
आंदोलन में संघ की भागीदारी को लेकर सवाल किए जाते हैं। प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल प्लेटफार्म पर भी स्वतंत्रता आंदोलन में संघ के अलिप्त रहने की चर्चा एक बार फिर चुनावी माहौल में छाने वाली है। इसलिए जरूरी हो जाता है कि संघ के आद्य सर संघ चालक की स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागिता की तथ्यों के आधार पर पड़ताल की जाय न कि पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर सुनी सुनाई या यूं कहें ऐसे ही कही जाने वाली बातों को मान लिया जाय।
सन 1921 में नागपुर में ब्रिटिश सरकार ने डा. हेडगेवार पर ‘राजद्रोह’ का मुकदमा चलाया था। मुकदमे की सुनवाई के दौरान डॉक्टर साहब ने उपनिवेशवाद को अमानवीय, अनैतिक, अवैधानिक एवं क्रूर शासन की संज्ञा दी थी। ब्रिटिश न्यायिक व्यवस्था, पुलिस प्रशासन एवं राजसत्ता के विरुद्ध
सभी प्रकार के विरोधों का समर्थन किया। इस पर उत्तेजित न्यायाधीश ने उनकी तर्को को पहले के भाषणों से भी अधिक ‘राजद्रोही’ घोषित किया। उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण सात वर्ष पूर्व ही औपनिवेशिक सरकार ने उन्हें ‘ सम्भावित ख़तरनाक राजनीतिक अपराधी ‘ की सूची में शामिल कर लिया था । इससे 6 वर्ष पूर्व 1909 में उनपर लोगों को सरकार के खिलाफ उकसाने एवं पुलिस चौकी पर बम फेंकने का आरोप लगाया जा चुका था । इसे सभी जानते है कि नागपुर के एक स्कूल में ‘ वंदेमातरम ‘ की
उदघोषणा करने और इसके लिए माफी न माँगने के कारण उन्हें स्कूल से निष्काषित किया गया था।असहयोग आंदोलन के बाद ‘ सविनय अवज्ञा आंदोलन’ में सत्याग्रह का नेतृत्व करते हुए वे गिरफ्तार हुए और उन्हें नौ महीने के सश्रम कारावास की सज़ा मिली थी। प्रोफेसर राकेश सिन्हा डा. केशव बलिराम हेडगेवार पर अपना शोध प्रबंध दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किए हैं। उनकी लिखी किताब में स्वाधीनता आंदोलन में डा. हेडगेवार की भागीदारी के अनेक रूप एवं घटनाएं हैं। वास्तव में हेडगेवार की गतिविधियां एवं चिन्तन राष्ट्र की स्वतंत्रता के प्रश्न तक ही सीमित
नहीं थी। एक प्राचीन भारत का पराभव क्यों हुआ और इसे सबल और संबल व संगठित राष्ट्र कैसे बनाया जा सकता है, — इन प्रश्नों का समाधान एक स्वप्नद्रष्टा के रूप में जीवन भर ढूंढते रहे । उन्होंने 1925 में इसी उद्देश्य को अपने समक्ष रख कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। वे भारतीय संस्कृति के परम उपासक थे । वह कर्मठ , सत्यनिष्ठ और राष्ट्रवादी होने के साथ- साथ एक स्वतंत्रचेता भी थे। उन्होंने हिंदुओ में नई चेतना जाग्रत करने के लिए उल्लेखनीय कार्य किए। डॉक्टर हेडगेवार अपनी चारित्रिक विशेषताओं के कारण महान थे। उनके पास नैतिक शक्ति का विपुल भंडार था। उन्होंने अपने लिए कोई घर
नहीं बनाया। सम्पूर्ण भारत ही उनका घर था। वे प्रचार एवं प्रसिद्धि से दूर रहते थे। हर चुनाव में संघ की विचार धारा को लेकर अलग – अलग विमर्श होते रहते है और इस बार फिर होंगे। होना भी चाहिए लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि खोजी जानकारी से
आज की युवा पीढ़ी वंचित न रहे। हर युवा को यह जानना ही चाहिए कि विश्व के सबसे बड़े स्वंय सेवी संगठन के संस्थापक की स्वतंत्रता आंदोलन में क्या
भूमिका रही । स्वामी विवेकानंद , डॉक्टर राम मनोहर लोहिया आदि कहा करते थे कौन क्या कह रहा
है , इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप किसी के बारे में क्या जानते है । जानने का तरीका है सर्च और रिसर्च। समस्या है आज हम रिसर्च नही करते।
जो सुना उसी के आधार पर धारणा बना लेते हैं। डा. हेडगेवार के बारे में भी ऐसा ही कुछ कहा सुना जाता है।

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