सोनभद्र।
4 मार्च 1989 — यह तिथि केवल प्रशासनिक पुनर्गठन की नहीं, बल्कि स्वाभिमान, संघर्ष और सपनों के साकार होने की तिथि है। जब उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद का दक्षिणांचल पृथक होकर नवसृजित जनपद सोनभद्र बना, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने इसे “भारतभद्र” बनाने का स्वप्न देखा था। आज, 4 मार्च

2026 को पीछे मुड़कर देखें तो निस्संदेह बहुत कुछ बदल गया है। विकास की अनेक उपलब्धियाँ हमारे सामने हैं — ऊर्जा उत्पादन, औद्योगिक विस्तार और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में सोनभद्र ने अपनी पहचान स्थापित की है। किन्तु आत्ममंथन भी आवश्यक है। भ्रष्टाचार का संस्थागत रूप लेना, अवैध खनन की प्रवृत्ति, पर्यावरण प्रदूषण की चिंता, सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण तथा जन्म से विवाह तक के सनातनी संस्कारों में पाश्चात्य प्रभाव के कारण आई विकृतियाँ — ये वे प्रश्न हैं जो हमारी आत्मा को झकझोरते हैं। विकास यदि संस्कृति और नैतिकता से विमुख हो जाए, तो वह अधूरा रह जाता है। सृजन दिवस हमें केवल उत्सव का अवसर नहीं देता, बल्कि यह संकल्प का भी दिवस है कि हम सोनभद्र को केवल औद्योगिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, नैतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी समृद्ध बनाएँ। मैं इस ऐतिहासिक अवसर पर उन सभी राजनीतिक दलों के समर्पित कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं, व्यापारियों, पत्रकारों, साहित्यकारों और जागरूक नागरिकों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ, जिनके अथक प्रयास और संघर्ष से इस जनपद का सृजन संभव हुआ। आइए, सृजन दिवस पर हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि सोनभद्र को “भारतभद्र” की परिकल्पना के अनुरूप आदर्श जनपद बनाने हेतु अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करेंगे। सोनभद्र की धरती सदैव समृद्ध, संस्कारित और स्वाभिमानी रहे — यही मंगलकामना।
✍️भोलानाथ मिश्र
सलाहकार संपादक
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