योगी ने बनाया बेहतर बिजली को हथियार, पर मंत्री श्रीकांत और साहब आलोक कुमार से गए हार

अलोक कुमार से नहीं संभल रहा विभाग, पीएम, सीएम की मौजूदगी में अलीगढ की शार्ट सर्किट की घटना से नाराज योगी ने किया तलब

आलोक कुमार की भ्रष्टाचारियों को प्रश्रय देने की नीति ने योगी सरकार के सुशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं

लखनऊ । उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन से चुनावी मुकाबले के लिए योगी सरकार के सबसे बड़े हथियार बेहतर बिजली व्यवस्था को खोखला करने में इसी सरकार के लाड़ले मंत्री श्रीकांत शर्मा और प्रमुख सचिव आलोक कुमार जुटे हैं। कार्यकर्त्ताओं में नाराजगी, बेंअंदाजी को लेकर जहां श्रीकांत शर्मा ने मथुरा के आसान चुनाव को मुश्किल बना दिया है वहां आलोक कुमार की भ्रष्टाचारियों को प्रश्रय देने की नीति ने योगी सरकार के सुशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं.। प्रमुख सचिव ऊर्जा की बेफिक्री का आलम तो यह है कि आरोपी, चार्जशीटेड, सरकारी माल लूटने वाले, बिजली घर फूंकने वाले अफसर भी उनकी सरपरस्ती में चैन की बंशी बजा रहे हैं। यह सब कुछ तब हो रहा है जब गांवों, शहरों को बेहतर सप्लाई, सौभाग्य योजना जैसे बड़े दावों के साथ खुद योगी य़ूपी में मुश्किल हालात में भाजपा की नैय्या पार लगाने में जुटे हैं. अलोक कुमार से नहीं संभल रहा ऊर्जा विभाग नाराज मुख्यमंत्री ने किया तलब. अलीगढ के नुमाईस मैदान के मंच पर पीएम मोदी और सीएम योगी की मौजूदगी में शार्ट सर्किट से हुई स्पार्किंग के मामले में खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अलोक कुमार को तलब किया है।
जिस उर्जा और पुलिस विभाग की कामयाबी का गुणगान कर सरकार चुनावी मैदान में है उसकी हकीकत इससे इतर है।उज्ज्वल योजना में अनियमितता, बिजली के मीटर खरीद में धांधली, मीटर रीडिंग से लेकर बिलिंग तक में गडबडी जिसका शिकार खबरों की मानें तो खुद विभाग के पूर्व चेयरमैन अवनीश अवस्थी भी हो चुके हैं. मनमाने ढंग से ऊर्जा विभाग चला रहे अलोक कुमार विभाग में हो रहे भ्रष्टाचार और उसकी जांच को लेकर आँख बंद किये हुए हैं और निगम के कुछ प्रकरणों की मानिटरिंग करने वाला मुख्यमंत्री सचिवालय भी या तो चुप है या फिर उसको गुमराह किया गया है।
यूपी के ऊर्जा विभाग में अजब खेल चल रहा है जोकि यह समझने के लिए काफी है कि कि ,ओबरा, पारीछा, हरदुआगंज जल गया लेकिन कोई दोषी नहीं और जब ओबरा काण्ड में दोषियों की तलाश हुई तो अलोक कुमार की मेहरबानियाँ भी दिखने लगीं। अलोक कुमार की नाक के नीचे निदेशक तकनीकी उत्पादन निगम बीएस तिवारी के खेल उजागर हैं, संविदा पर आए और प्रोबेशन पर चल रहे दागी निदेशक कार्मिक संजय तिवारी को संरक्षण देकर कार्मिक प्रबंधन के क्षेत्र में इतिहास रच रहे हैं. देश की नही दुनिया भर के कार्मिक एवं सेवायोजन के नियमों से उलट बिजली विभाग में संविदा पर भर्ती और प्रबोशन पर चल रहे कार्मिक निदेशक संजय तिवारी को गंभीर मामले में चार्जशीट देने के बाद भी उससे बदस्तूर काम लिया जा रहा है. चर्चा तो यह भी है कि प्रमुख सचिव द्वारा इनको आने वाले तबादला सीजन को इंज्वाय कराने का इरादा है.
इसके अलावा चार्जशीटेड, प्रोबेशन पर चल रहे संविदा वाले निदेशक पर मेहरबान सुशासन सरकार के पहरेदार आलोक कुमार न बढ़ा सके बिजली का उत्पादन, न भ्रष्टाचारियों पर लगाम कस पाए हैं बल्कि दागियों से ही काम ले रहे हैं. जवाहरपुर सरिया चोरी प्रकरण की दिखावे के तौर परSIT जांच के लिए प्रमुख सचिव गृह को लिख तो दिया लेकिन उसमें आगे की कहानी ठन्डे बसते में डाल दिया. संविदा कर्मी जोकि निगम के कर्मचारी हैं ही नहीं उनके भी तबादले का आदेश जारी कर दिया. आगरा डिस्काम के निदेशक कार्मिक द्वारा बेटे को ठेका दिए जाने और इसमें एमडी की संलिप्तता की खबर के बाद जांच के लिए लिख दिया लेकिन नतीजा शून्य रहा। बिजली उत्पादन के लिए नई यूनिट लाना तो दूर पुरानी बंद हो रही हैं जबकि इसके पहले संजय अग्रवाल लगभग इतने ही समय में सूबे के लिए लगभग 4 यूनिट लाकर चलवाने में कामयाब रहे थे. यही नहीं संजय अग्रवाल द्वारा लाये गए कोल ब्लाक को भी अभी तक ये नहीं चलवा सके हैं जिससे नवीन परियोजनाओं के लिए कोयले का संकट सुनिश्चित है।
आलोक कुमार लगातार मनमानियां कर रहे चंद निदेशकों को भरपूर संरक्षण देने का काम कर रहे हैं और तमाम तरह के प्रमाणित आरोप होने के बावजूद उन पर कार्यवाही करने के बजाय उनको बचाने के प्रयास में लगे हैं. अफसरों की कार्यशैली से किरकिरी का दंश झेल रही योगी सरकार के अलोक कुमार अपनी कमियों को छिपाने के लिहाज से मीडिया द्वारा किसी जांच के सम्बन्ध में पूछे जाने पर सर्वथा मौन रहते हैं और दोषियों को बचाने के काम में लगे रहते हैं. लोगों का यहाँ तक कहना है कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से मिलना आसान है लेकिन अलोक कुमार से नहीं. इनके बारे में आम शोहरत है कि मुख्यमंत्री के अलावा ये किसी दूसरे मंत्री या सत्तारूढ़ दल के किसी भी बड़े नेता की बात भी नहीं मानते हैं. यही नहीं कहा तो यहां तक जाता है कि अव्वल तो ये सूबे की ब्यूरोक्रेसी के मुखिया यानी मुख्य सचिव अनूप पांडेय की बात नहीं सुनते और यदि सुनते हैं तो करते वहीं हैं जो ये चाहते हैं. यही नहीं कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि खुद उर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा भी इनसे कुछ कहने से डरते हैं।
अलोक के अलावा निगम में प्रबंध निदेशक की कुर्सी पर बैठने वाला भी किसी न किसी को बचाने के काम में लगा रहा है पहले एमडी रहे अमित गुप्ता ने जवाहरपुर सरिया चोरी में लिप्त पाए गये तत्कालीन परियोजना निदेशक यूएस गुप्ता को बचाते हुए प्रगति ईकाई का मुखिया बना दिया था. लेकिन इन्हीं गुप्ता को सही अंजाम तक पहुंचाने वाले वर्तमान एमडी सेंथिल पांडियन भी कल्याण अधिकारी मानसिंह से हार गए. प्रबंध निदेशक बनने के बाद पांडियन ने जो तेजी दिखाई उसकी धार अब कुंद हो गयी. राख हो चुकी ओबरा यूनिट में बिजली उत्पादन शुरू कर वाहवाही बटोरने वाले पांडियन के पास संजय तिवारी द्वारा नियम विरुद्ध तरीके से एक फंड ट्रांसफर के केस में जांच पड़ी है जिसपर उनके द्वारा कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा है. बिजली विभाग में विगत वर्ष हुए कुछ महत्वपूर्ण प्रकरण जिनपर आलोक कुमार द्वारा पर्दा डालने और दोषियों को बचाने का काम किया जा रहा है पर नजर डालें तो इनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े होते हैं।

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