लोक संग्रहक थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय!

सोनभद्र(सर्वेश श्रीवास्तव)। स्मृति शेष पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन करते हुए मीडिया फोरम आफ इंडिया न्यास के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष एवं सोन साहित्य संगम के निदेशक मिथिलेश प्रसाद द्विवेदी ने रविवार को उन्हें याद करते हुए कहा कि पत्रकार साहित्यकार भानु प्रताप शुक्ल जी का संस्मरण दीनदयाल जी के भीतर के लोक संग्रहक को स्पष्ट करता है —- कभी कभी ऐसे भी प्रसंग आये कि उनकी व्यस्तता का बिना विचार किये हम कुछ इस कदर मचल उठते थे ,जैसे वे फालतू हों और हम व्यस्त हों । पंडित जी लेख लिख दीजिये और आप नही लिखेंगे तो कौन लिखेगा। आप के विचार पाठक पाञ्चजन्य में पढ़ना चाहते हैं । इसके उत्तर में वे बड़े ही आनंदित करने वाले स्वर में बोले ,” मेरे और तुम्हारे विचार में क्या अंतर है ? अंतर नाम का पड़ सकता है , सो उसकी जगह लिख दो— दीनदयाल उपाध्याय यदि कोई गड़बड़ होगी तो मैं देख लूंगा और जब कुछ घण्टे बाद लेख उनके पास जाता तो पढ़वा कर सुनते और उसकी खुलकर प्रशंसा करते, इसके अमुक- अमुक पहलू पर तो मेरा ध्यान ही नही गया था । लेख रख जाओ , मैं एक बार फिर देख लूंगा । और जब फिर जाता तो पुराने लेख की जगह एक नया लेख उनके ही अक्षरों में लिखा प्राप्त हो जाता ।

कोई हमें निकाल देगा क्या ?


ओम प्रकाश गर्ग का संस्मरण देखें— सन 1957 के निर्वाचन के पूर्व लखनऊ में एक पत्रकार सम्मेलन में उन्हें जाना था । उन्होंने अपने बक्से से धुली धोती निकाल कर लाने को कहा । धोती निकाली और वे पहनने लगे तो देखा कि धोती फटी है । मैंने दूसरी लाने का आग्रह किया तो कहने लगे फटी है तो क्या ,साफ तो है । कोई हमें निकाल देगा क्या इसके कारण । कहने का तात्पर्य यह कि वे वस्तु के गुणों को जीवन में स्थान देते थे । ऐसे गुणी और लोक संग्रह थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय।

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