जानिये पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से अश्वगंधा: के गुण धर्म एवं लाभ

स्वास्थ्य डेस्क। जानिये पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से अश्वगंधा: के गुण धर्म एवं लाभ



नाम — अंग्रेजी– विंटर चेरी

संस्कृत– अश्वगंधा,, वराहकर्णी,, पलासपर्णी,, पिवरी,, पुष्टिदा,, बाजीकरी,, तुरगी

हिंदी– असगंध,, नागौरी असगंध
गुजराती– आसोद,, घोड़ा आहन,, आसुन
बंगाली– अश्वगंधा
तमिल– बाजीगंधा
तेलुगू– पनेरू

जानकारी यह बहुधा समशीतोष्ण प्रदेशों,, पश्चिमोत्तर भाग महाराष्ट्र,, गुजरात,, राजस्थान,, मध्यप्रदेश,, उत्तर प्रदेश,, पंजाब,, तथा जम्मू कश्मीर और हिमाचल में ५००० फुट की ऊंचाई पर पाया जाता है।। इसके अलावा पाकिस्तान,, अफगानिस्तान,, इजरायल,, मिस्र ,, जार्डन,, स्पेन तथा दक्षिण अफ्रीका में पाया जाता है।। बंगाल,, असम,, बर्मा आदि शुष्क प्रदेशों मे नागौरी असगंध पैदा होती है।।

स्वरूप इसका पौधा ३-४ फुट का होता है और ३-४ वर्ष तक जीवित रहता है।। टेढ़ी शाखाओं वाला यह पौधा वर्षाकाल में पैदा होता है।। पेड़ों तथा तालाब के पास १२ महीने हरा रहता है।। कच्चे जड़ या पत्तों को मसलने से अश्व के मूत्र की गंध आती है इसीलिए इसका नाम अश्वगंधा पड़ा है।।

गुण धर्म लघु,, स्निग्ध,, कसैली,, कड़वी,, मधुर,, उष्ण,, शुक्रल होती है।। प्रभाव में रसायन,, कांतिजनक पुष्टिकारक है और जलव्याधि,, वात,, कफघ्न,, श्वास हर,, क्षय,, शोथहर,, विषशामक,, कृमि नाशक,, कण्डू, ब्रण,, प्रामवातनाशक,, वेदनास्थापन, मस्तिष्कशामक,, रक्तशोधक,, शूलप्रशमन,, बाजीकरण,, गर्भाशयशोध हर तथा योनिशूलहर है।।यह मूत्रल,, बल्य,, बृहंण रसायन है।। एक वर्ष तक यथाविधि सेवन करने से शरीर निर्विकार हो जाता है।। जड़ का सेवन करते हैं।।

औषधीयप्रयोग अश्वगंधा का प्रयोग ल्यूकोडर्मा,, ब्राकायटिस और अस्थमा में बहुत फायदेमंद है। यह एक टानिक है जिससे शुक्राणु बढ़ते हैं,, कामोत्तेजक है।। इसकी सब्जी क्षय रोगियों को दी जाती है,, खून में लौह तत्व को बढ़ाता है,, एंटी ट्युमर है,, इसमें पाई जाने वाली बायदाफेमिन नामक रसायन कैंसर के विषाणुओं को मारने में सक्षम है।

बच्चों की कमजोरी चूर्ण को दूध,, घी के साथ सेवन कराने से बच्चों और बड़े की कमजोरीदूर होती है,, वृद्धावस्था में सुधार आता है।।

निद्रा नाश व क्षय उन्मूलन अश्वगंधा का चूर्ण गोघृत के साथ चाटने से निद्रा नाश व कटिशूल में लाभ होता है।। इसके क्वाथ से क्षय रोग में लाभ होता है।। पत्तों के रस में शहद मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है।।

कमर दर्द चूर्ण को घी और मिश्री के साथ सेवन करने से लाभ होता है।।

अंधापन अश्वगंधा और मुलेठी का चूर्ण आंवले के रस के साथ सेवन करने से लाभ होता है।।

हृदय वात पीड़ा अश्वगंधा और बहेड़ा चूर्ण गुड़ के साथ सेवन करने से लाभ होता है।।

सर्व रोग अश्वगंधा चूर्ण, गिलोय चूर्ण और शहद मिलाकर सेवन करने से सब रोगों में लाभ होता है।।

वात रोग अश्वगंधा चूर्ण,, शतावरी घृत व शहद मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है।।

प्रमेह अश्वगंधा चूर्ण व आंवला का सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है।।

कब्ज अश्वगंधा चूर्ण गर्म दूध के साथ सेवन करने से कब्ज दूर होती है।।

नपुंसकता अश्वगंधा चूर्ण व चीनी समान मात्रा में रोजाना ३-६ ग्राम गाय के दूध के साथ सेवन करने से नपुंसकता दूर होती है।।

बल वीर्य वृद्धि अश्वगंधा चूर्ण चौथाई भाग घी मिलाकर दूध या गुनगुने पानी के साथ एक मास तक सेवन करने से बल वीर्य में वृद्धि होती है।। सब प्रकार के दर्द आदि वायु विकार शांत होते हैं।।

स्वप्नदोष अश्वगंधा,, विधारा,, जायफल,, छोटी इलायची,, नागरमोथा,, क्रौंच बीज,, गोखरू,, शतावरी, त्रिफला,, लाजवंती,, खस और वंशलोचन समभाग ले कर पीसकर छान लें।। समान मात्रा में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम ६ ग्राम गाय के दूध के साथ सेवन करने से स्वप्नदोष दूर होता है ।

माताओं में दूध की कमी अश्वगंधा,, विदारीकंद और मुलेठी मिलाकर क्वाथ सिद्ध करके गोगुग्ध के साथ सेवन करने से दूध की कमी दूर होती है।।

गठिया अश्वगंधा के पंचांग (जड़,, छाल,, पत्ते, फूल,, फल) को कूट कर रस निकाल कर २.५-५ ग्राम सेवन करने से गठिया वात दूर होती है।।

संधिवात अश्वगंधा चूर्ण ३ ग्राम समभाग घी और मिश्री मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।।

रक्त विकार अश्वगंधा और चोपचीनी समान मात्रा में ४ ग्राम शहद के साथ सेवन करने से रक्त विकारोंमें लाभ होता है।

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