जानिये पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से विभूति (भस्मी)

धर्म डेक्स। जानिये पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से विभूति (भस्मी)

भस्म का अर्थ एवं महत्त्व
‘भस्म’ शब्द में ‘भ’ अर्थात ‘भत्र्सनम्’ अर्थात ‘नाश हो’ । ‘स्म’ अर्थात स्मरण । भस्म के कारण पापों का निर्दालन होकर ईश्वर का स्मरण होता है । शरीर नाशवान है । इसे निरंतर स्मरण रखने का जो प्रतीक है, वह भस्म है; ऐसा भस्म शब्द का भावार्थ है । विभूति, रक्षा एवं राख ये भस्म के समानार्थी शब्द है।

विभूति, भस्म या पवित्र राख के इस्तेमाल के कई पहलू हैं। पहली बात, वह ऊर्जा को किसी को देने या किसी तक पहुंचाने का एक बढ़िया माध्यम है। इसमें ‘ऊर्जा-शरीर’ को निर्देशित और नियंत्रित करने की क्षमता है। इसके अलावा, शरीर पर उसे लगाने का एक सांकेतिक महत्व भी है। वह लगातार हमें जीवन के नश्वरता की याद दिलाता रहता है, मानो आप हर समय अपने शरीर पर नश्वरता ओढ़े हुए हों।

भस्म बनाने की विधि

आम तौर पर योगी श्‍मशान भूमि से उठाई गई राख का इस्तेमाल करते हैं। अगर इस भस्म का इस्तेमाल नहीं हो सकता, तो अगला विकल्प गाय का गोबर होता है। इसमें कुछ दूसरे पदार्थ भी इस्तेमाल किए जाते हैं लेकिन मूल सामग्री गाय का गोबर होती है। अगर यह भस्म भी इस्तेमाल नहीं की जा सकती, तो चावल की भूसी से भस्म तैयार की जाती है। यह इस बात का संकेत है कि शरीर मूल पदार्थ नहीं है, यह बस भूसी या बाहरी परत है।

‘देसी गाय का गोबर धरती पर गिरने से पहले ही जमा कर लें । इस गोबर से बने उपले को जलाने पर जो राख बनती है, उसे ‘भस्म’ कहते हैं । जिस स्थान पर भस्म सिद्ध करना हो, उस स्थान को गोबर से लीपें । गोमूत्र अथवा विभूति का तीर्थ छिडककर स्थान शुद्ध करें । वहां रंगोली बनाएं । तदुपरांत हवनपात्र अथवा किसी चौडे पात्र में उपलें रखें । उन पर देसी गाय का घी डालें । कुलदेवता, इष्टदेवता एवं गुरु से प्रार्थना कर कर्पूर से उपले प्रज्वलित करें । कुलदेवता अथवा इष्टदेवता का नामजप करें । भस्म सिद्ध होने के उपरांत एक पात्र में भरें । तदुपरांत यदि संभव हो, तो उस पात्र को दर्भ अथवा दाहिने हाथ से स्पर्श कर दस बार गायत्री मंत्र कहें । ऐसा करने से भस्म अभिमंत्रित होती है । भस्म अभिमंत्रित करना, अर्थात भस्म में देवता का चैतन्य लाना । गायत्री मंत्र का पुरश्चरण कर भस्म अभिमंत्रित करने से उस भस्म के उपयोग का लाभ अधिक मिलता है । भस्म अभिमंत्रित करनेवाले व्हृाक्ति ने यदि गायत्री मंत्र का पुरश्चरण न किया हो, तो वह भावपूर्ण रूप से ‘ॐ नमः शिवाय ।’ का नामजप करे अथवा सिद्ध किए गए किसी भी शिवमंत्र का उच्चारण करे ।

जलते कंडे में जड़ीबूटी और कपूर-गुगल की मात्रा इतनी डाली जाती है कि यह भस्म ना सिर्फ सेहत की दृष्टि से उपयुक्त होती है बल्कि स्वाद में भी लाजवाब हो जाती है। श्रौत, स्मार्त और लौकिक ऐसे तीन प्रकार की भस्म कही जाती है। श्रुति की विधि से यज्ञ किया हो वह भस्म श्रौत है, स्मृति की विधि से यज्ञ किया हो वह स्मार्त भस्म है तथा कण्डे को जलाकर भस्म तैयार की हो वह लौकिक भस्म है।

आप उसे अपने शरीर पर जहां भी लगाते हैं, वह अंग अधिक संवेदनशील हो जाता है और परम प्रकृति की ओर अग्रसर होता है। इसलिए, सुबह घर से निकलने से पहले, आप कुछ खास जगहों पर विभूति लगाते हैं ताकि आप अपने आस-पास मौजूद ईश्वरीय तत्व को ग्रहण कर सकें, शैतानी तत्व को नहीं। उस समय आपका जो भी पहलू ग्रहणशील होगा, उसके आधार पर आप अलग-अलग रूपों में और अपने विभिन्न आयामों से जीवन को ग्रहण कर सकते हैं। आपने ध्यान दिया होगा – कभी आप किसी चीज को देखकर एक खास तरीके से उसका अनुभव करते हैं, फिर किसी और समय आप उसी चीज का अनुभव बिल्कुल अलग रूप में करते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि आप जीवन को किस रूप में ग्रहण करते हैं। आप चाहते हैं कि आपके उच्च पहलू ग्रहणशील हों, न कि निम्न पहलू।

भस्म कैसे लगायें?

पारंपरिक रूप से भस्म को अंगूठे और अनामिका के बीच लेकर – ढेर सारी विभूति उठाने की जरूरत नहीं है, बस ज़रा सा लगाना है – भौंहों के बीच, जिसे आज्ञा चक्र कहा जाता है, गले के गड्ढे में, जिसे विशुद्धि चक्र कहा जाता है और छाती के मध्य में, जिसे अनाहत चक्र के नाम से जाना जाता है, में लगाया जाता है। भारत में आम तौर पर माना जाता है कि आपको इन बिंदुओं पर विभूति जरूर लगानी चाहिए। इन खास बिंदुओं का जिक्र इसलिए किया गया है क्योंकि विभूति उन्हें अधिक संवेदनशील बनाती है।

भस्म आम तौर पर अनाहत चक्र पर इसलिए लगाई जाती है ताकि आप जीवन को प्रेम के रूप में ग्रहण कर सकें।

उसे विशुद्धि चक्र पर इसलिए लगाया जाता है ताकि आप जीवन को शक्ति के रूप में ग्रहण करें, शक्ति का मतलब सिर्फ शारीरिक या मानसिक शक्ति नहीं है, इंसान बहुत से रूपों में शक्तिशाली हो सकता है। इसका मकसद जीवन ऊर्जा को बहुत मजबूत और शक्तिशाली बनाना है ताकि सिर्फ आपकी मौजूदगी ही आपके आस-पास के जीवन पर असर डालने के लिए काफी हो, आपको बोलने या कुछ करने की जरूरत नहीं है, बस बैठने से ही आप अपने आस-पास की स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं। एक इंसान के भीतर इस तरह की शक्ति विकसित की जा सकती है।

विभूति को आज्ञा चक्र पर इसलिए लगाया जाता है, ताकि आप जीवन को ज्ञान के रूप में ग्रहण कर सकें।

यह बहुत गहरा विज्ञान है लेकिन आज उसके पीछे के विज्ञान को समझे बिना हम बस उसे एक लकीर की तरह माथे पर लगा लेते हैं। यह मूर्खता है कि एक तरह की लकीरों वाला व्यक्ति दूसरी तरह की लकीरों वाले व्यक्ति से खुद को अलग समझता है। भस्म शिव या किसी और भगवान की दी हुई चीज नहीं है। यह विश्वास का प्रश्न नहीं है। भारतीय संस्कृति में, उसे गहराई से किसी व्यक्ति के विकास के उपकरण के रूप में देखा गया है। सही तरीके से तैयार विभूति की एक अलग गूंज होती है। इसके पीछे के विज्ञान को पुनर्जीवित करने और उसका लाभ उठाने की जरूरत है।

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