जानिये पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से (ज्योतिष चर्चा) धनु राशि एवं लग्न परिचय…..

धर्म डेक्स। जानिये पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से (ज्योतिष चर्चा) धनु राशि एवं लग्न परिचय…..



धनुर्लग्न समुत्पन्नो नीतिमान धनवान सुधी:।
लोके मान्य:कुले श्रेष्ठ: पुत्र पौत्रादि संयुतः।।
बहुकलाकुशल:, सत्यप्रतिज्ञ: सुतरां मनोज्ञ:।
धनुविधिज्ञश्च धनुर्धरगे नरो धनकरो पि न करोति बहुव्यवयं।।

अर्थात धनु लग्न में उत्पन्न मनुष्य नीति कुशल, धनी, बुद्धिमान, लोगो मे सम्मानित, कुल में श्रेष्ठ, धन, वाहन, पुत्र-पौत्रादि सुखों से युक्त होता है। ऐसा जातक शिल्पादि अनेक कलाओं में कुशल, निर्मल बुद्धि, सत्यनिष्ठ, सुंदर स्वरूप, विद्वान, धनुर्विद्या (अर्थात शस्त्र संचालन में कुशल), धनवान होने पर भी कृपणता से धन का व्यय करता है।

राशि चक्र में धनु नौंवी राशि है।भचक्र में इस राशी का विस्तार 240° से 270° है। इस राशि का अधिपति स्वामी ग्रह गुरु है। जो कि सौरमंडल में सर्वाधिक बड़ा ग्रह भी है।गुरु की यह त्रिकोण राशि है। लग्न के रूप में यह प्रथम व चतुर्थ भाव का स्वामी हो जाता है। काल पुरुष में इस राशि का निवास (संबंध) जंघाओं, नसों तथा नितंबों में होता है। यह राशि मूल नक्षत्र के चार चरण (ये, यो, भ, भी) पूर्वाषाढ़ के चार चरण (भ, धा, फ़, ढ़) एवं उत्तराषाढ़ का एक चरण (भे) से मिलकर बनी है। मूल नक्षत्र का स्वामी केतु, पूर्वाषाढ़ का शुक्र तथा उत्तराषाढ़ का स्वामी सूर्य है।

किसी जातक के जन्म समय का लग्न स्पष्ट जिस नक्षत्र के अंश या पाद चरण पर होता है, उस नक्षत्र भाग के स्वामी के अनुरूप भी जातक के व्यक्तित्त्व पर प्रभाव पड़ता है। धनु लग्न में नवम भाग (26°-40′ से 30°-00′ तक) का नवांश लग्न धनु ही होगा जो कि वर्गोत्तम होगा।

धनु राशि इंद्रधनुषीय कामनाओं और आशाओं की प्रतीक है। यह विषम राशि मध्यमआकार, पुरुष राशि, धनुष धारण किए कटी से ऊपर मनुष्य और नीचे अश्व घोड़े के समान आकार की, अल्प प्रसवी उग्र प्रकृति की सतोगुणी राशि है। यह अग्नि तत्व, दुःस्वभावा, बाल्यावस्था रात्रि बली, पित्र प्रकृति, क्षत्रिय जाति, पृष्ठोंदई, पूर्व दिशा की स्वामिनी है। इसका प्राकृतिक स्वभाव मर्यादा पालन करना आदर्श एवं अधिकार प्रियता है। वाहनों के प्रति विशेष लगाव रहता है। कोई भी ग्रह इस राशि में नीच या उच्च का नहीं होता परंतु कुछ विद्वान राहु को इस राशि में नीच एवं केतु को उच्च मानते हैं। गुरु इस राशि पर 5 से 10 अंश तक मूलत्रिकोणस्थ माना जाता है। निर्जन सूर्य गोचर वश प्रतिवर्ष प्रायः 15 दिसंबर से 13 जनवरी तक इस राशि पर संचार करता है।

धनु राशि के अन्य पर्याय नाम👉 अश्व, अस्त्री, चाप, धनुषक, धनुषमाण, अश्वकाय, शरासन आदि अंग्रेजी में इसे सैजिटेरियस (saggitarius) कहते हैं।

गुण एवं सामान्य विशेषताएं👉 धनु राशि का स्वामी गुरु है। धनु जातक का स्वभाव इस राशि के प्रतीक धनुर्धारी से अभिव्यक्त किया जा सकता है। जिस प्रकार धनुर्धारी सीधा लक्ष्यबेध करता है। उसी प्रकार धनु लग्न जातक का लक्ष्य की तरफ ध्यान केंद्रित रहता है। जातक सोच विचार कर कार्य करता है। यदि गुरु बुध की स्थिति शुभ हो तो जातक बुद्धिमान, सौम्य, सरल स्वभाव, धार्मिक प्रकृति, उदार हृदय, परोपकारी, संवेदनशील, करूंणा दया आदि भावनाओं से युक्त होगा। दूसरों के मनोभावों को जान लेने की विशेष क्षमता होगी इस राशि के व्यक्ति में बौद्धिक एवं मानसिक शक्ति प्रबल होती है।

धनु लग्न में शुभाशुभ एवं योगकारक ग्रह

सूर्य👉 सूर्य धनु लग्न में शुभ कारक होता है। भाग्येश एवं धर्मेश होने के कारण शुभ भाव में हो तो जातक धार्मिक, आस्थावान एवं भाग्यशाली होगा। सूर्य की दशा में शुभ फल घटित होंगे।

चंद्रमा👉 अष्टमेष होने से यद्यपि स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं किंतु कल्पना शक्ति एवं विद्वत्ता की दृष्टि से जातक विद्वान प्रतिष्ठित एवं अध्ययनशील होगा अड़चनों के बाद सफलता मिलेगी।

मंगल👉 पंचमेश होने से जातक को बौद्धिक क्षमत, संतान सुख (पुत्र संतति) एवं शिक्षा के संबंध में शुभ फलदायक परंतु व्ययेश भी होने से आकस्मिक विघ्न बाधाएं, धन का अपव्यय तथा तनाव देता है। अपनी दशा में मिश्रित फल देता है।

बुध👉 सप्तमेश व कर्मेश होने से विवाह एवं व्यवसाय आदि की दृष्टि से प्रायः शुभ फल देता है। परंतु केंद्रश दोष होने से उसके शुभ कार्यकत्व गुणों एवं फल में कमी आ जाती है। अपनी दशा अंतर्दशा में शुभाशुभ फल बुध की स्थिति पर निर्भर करेगा।

गुरु👉 लग्न एवं चतुर्थ (सुख) भाव का स्वामी होने से शुभफली होता है। केंद्राधिपत्य दोष युक्त भी होता है। परंतु लग्नेश होने के कारण मारकत्व आदि दोष नहीं होंगे तथा अशुभ फल कम ही देगा। गुरु यदि कुंडली में अशुभस्त हो तो अपनी दशा में कष्टों के बाद सफलता देगा।

शुक्र👉 त्रिषडायपति अर्थात छठे भाव व 11 वे भाव का स्वामी होने से प्रायः इस लग्न में अशुभ फल देता है। किंतु 2, 3, 4, 7, 8, एवं 11 वे भाव में अपनी दशा में किंचित शुभफल प्रदान करेगा।

शनि👉 धनेश एवं तृतीय होने से अपनी दशा में मिश्रित प्रभाव करता है। 1, 3, 5, 7, 8, 9, 10, एवं 12 वे भावो में शुभ तथा शेष भागों में अशुभ फली होता है। फल दीपिका के अनुसार शनि पंचम भाव में नीच का होने पर भी लाभ स्थान व धन स्थान को उच्च एवं स्वराशि से देखने से अपनी दशा में शुभ फल प्रदान करता है।

राहु👉 2, 3, 5, 8, 9, 10, 11 एवं 12 वे भाव में शुभ शेष अन्य भाव में अशुभ फल करता है। दृष्टि योग आदि से फल में परिवर्तन भी संभव है।

केतु👉 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 11 एवं 12 वे भाव में शुभ तथा अन्य स्थानों में अशुभफल करता है।

विशेष👉 दो तीन या अधिक ग्रहों की स्थिति में अथवा ग्रहों की शुभाशुभ अवस्था एवं पारस्परिक दृष्टि यों के कारण उपरोक्त ग्रहों के शुभाशुभ फलों के संबंध में न्यूनाधिकता की संभावना भी होती है।

धनु लग्न-गुण स्वभाव, स्वास्थ्य-रोग, शिक्षा एवं कैरियर आदि

शारीरिक गठन एवं व्यक्तित्त्व👉 धनु लग्न कुंडली में गुरु एवं सूर्य शुभस्थ हो तो जातक का ऊंचा लंबा कद, संतुलित एवं सुगठित शरीर, सुंदर गेहूंआ रंग, किंचित चौड़ी एवं अंडाकार मुखाकृति, चौड़ा एवं ऊंचा माथा, प्राय लंबी नाक एवं लंबी पुष्ट गर्दन, बादाम जैसी आकृति की चमकदार आंखें, बड़े किंतु सुंदर मजबूत दांत, बौद्धिकता के प्रतिक बड़े कान, श्वेत पीत वर्ण (यदि लग्न में मंगल की दृष्टि आदि का योग हो तो श्वेत लालिमा मिश्रित वर्ण) तथा ऐसा जातक सौम्य, हंसमुख, आकर्षक, सुंदर एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला होगा।

चारित्रिक एवं स्वभावगत विशेषताएं

धनु लग्न अग्नि तत्व राशि तथा लग्न स्वामी गुरु शुभ होने से जातक अत्यंत बुद्धिमान, परिश्रमी, स्वाभिमानी, पराक्रमी, साहसी, धर्म परायण, इनमें अच्छे बुरे एवं दूसरों के भावों को जान लेने की विशेष क्षमता होगी, जातक स्पष्ट वक्ता, इमानदार, न्यायप्रिय, व्यवहार कुशल, उदार हृदय, मिलनसार, नरम दिल, सिद्धांतवादी एवं अध्ययन शील प्रकृति का होता है। यदि सूर्य भी शुभस्थ हो तो जातक कुल में श्रेष्ठ, भाग्यशाली तथा इनकी बौद्धिक एवं मानसिक शक्ति प्रबल होगी। ये जिस कार्य को करने का संकल्प कर लेता है उसे पूरे किया बिना नहीं छोड़ता। ऐसा जातक धन – संपदा एवं वाहन आदि सुख साधनों से युक्त तथा निज पराक्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला होगा। जातक धर्म परायण, परोपकारी स्वभाव तथा लोगों की भलाई का ख्याल बहुत रखेगा। जातक उच्च एवं श्रेष्ठ विचारों से युक्त, शिक्षक तथा उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साथ मेलजोल अधिक रखेगा। परंतु शनि यदि अशुभ हो तो जातक को भाई बंधुओं के सुख में कमी रहे तथा कार्य व्यवसाय के संबंध में अत्यधिक संघर्ष कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इनका 32 वर्ष की आयु के बाद विशेष भाग्योदय होता है।

धनु लग्न काल पुरुष के राशिचक्र में नवनी राशि होने से जातक को योगदर्शन, आध्यात्मिक, चिकित्सा आदि बौद्धिक विषयों में विशेष अभिरुचि होती है। ये अध्यात्म एवं जीवन संबंधी रहस्यों को जानने में प्रयत्नशील रहते हैं। मंगल गुरु के प्रभाव के जातक अध्ययनशील, आत्मविश्वास की भावना से युक्त, चुस्त, आशावादी दृष्टिकोण रखने वाला, दूसरों से सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करने वाला, महत्वकांक्षी, कठिन से कठिन समस्याओं को अपने धैर्य और साहस से ठीक कर लेने वाला होता है। जातक की देश-विदेश की यात्राओं के भी अवसर प्राप्त होते हैं।

धनु राशि द्विस्वभाव की राशि है। इसलिए ऐसे जातक शीघ्र कोई निर्णय नहीं कर पाते हैं। परंतु जब खूब सोच समझ के बाद निर्णय लेते हैं तो अपने कार्य को पूरे उत्साह एवं जोश के साथ आरंभ कर देते हैं। वैसे तो धनु जातकों को जल्दी से क्रोध नहीं आता परंतु यदि किसी कारण विशेष से आ भी जाए तो देर तक क्रोध आवेश में रहते हैं। केवल प्रेम व शांति से वशीभूत होते हैं। इनकी सूक्ष्म में बुद्धि होने के कारण किसी भी विषय की गहराई तक जाने में कुशल होते हैं। कुंडली में मंगल शुक्र का योग हो तो विपरीत योनि के प्रति विशेष आकर्षण होता है। यदि लग्न में पाप ग्रह अथवा पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक ईर्ष्यालु, जिद्दी, शीघ्र क्रोधित होने वाला, कठोर स्वभाव, स्वार्थ परक, कामुक एवं स्वच्छाचारी स्वभाव का होता है। ऐसा जातक दूसरे लोगों की आलोचना एवं व्यंगात्मक वाणी का प्रयोग करने वाला भी होता है।

स्वास्थ्य एवं रोग👉 धनु लग्न जातक की कुंडली में गुरु, सूर्य, मंगल आदि ग्रह शुभस्थ हो तो जातक का स्वास्थ्य अच्छा एवं श्रेष्ठ होता है। परंतु यदि लग्न में लग्नेश (गुरु) अशुभ हो तथा शनि, मंगल, शुक्र एवं राहु आदि ग्रहों का लग्न या लग्नेश के साथ अशुभ संबंध हो तो जातक को कमर में या जोड़ों में दर्द, रक्त विकार, लीवर एवं उदर विकार, नेत्र स्नायु रोग, प्रमेह, उच्च रक्तचाप, जिगर, यौन रोग, गुप्त एवं पेचीदा रोगों की संभावना रहती है। स्वास्थ्य में सावधानीवश धनु जातक को बहुत अधिक उष्ण एवं गरिष्ठ एवं तला हुआ भोजन नहीं लेना चाहिए। मादक वस्तुओं एवं मांस मछली आदि तामसिक भोजन के सेवन से भी परहेज करना चाहिए। अत्यधिक क्रोध तथा उत्तेजना, आवेश पूर्ण व्यवहार भी आपके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। पौष्टिक एवं संतुलित भोजन एवं नियमित व्यायाम आपके स्वास्थ्य एवं जीवन के लिए सुखद होंगे।

शिक्षा एवं कैरियर👉 धनु लग्न में गुरु पंचम भाव से एवं पंचमेश मंगल के साथ शुभ संबंध बनाता हो अथवा गुरु मंगल की दशा अंतर्दशा हो तो जातक उच्च शिक्षित विख्यात एवं उच्च पद पर प्रतिष्ठित होता है। धनु जातक गुरु और बुध के प्रभाव से प्राय: अध्ययनशील प्रकृति के होते हैं। जीवन में किसी भी व्यवसाय से संबंधित हो वह धर्म, ज्योतिष, गूढ़ विषयों के अध्ययन से जुड़े रहते हैं। मंगल, बुध, सूर्य आदि ग्रह स्वराशिस्थ या शुभस्थ हो तो जातक डॉ अथवा चिकित्सा के क्षेत्र में सफल होता है। यदि चंद्र-मंगल बुध आदि ग्रहों का योग केंद्र त्रिकोण में हो तो जातक इलेक्ट्रिक इंजीनियर होता है। पंचम में गुरु एवं केंद्र त्रिकोण में सूर्य बुध का योग होने से जातक वकालत के क्षेत्र में विशेष सफल रहता है। चंद्र, शुक्र एवं शनि ग्रहों के योग जातक या जातिका को अभिनय कला एवं फिल्म क्षेत्र में सफलता दिलाता है। सामान्यत: धनु जातक अपनी बौद्धिक योग्यता के बल पर उच्च व्यवसायिक विद्या प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। धनु जातक की कुंडली में सूर्य-बुध, सूर्य-मंगल, सूर्य-गुरु तथा गुरु-मंगल गुरु एवं बुध शुक्र के योग करियर की दृष्टि से विशेष प्रशस्त माने जाते हैं।

धनु लग्न-गुण आध्यात्मिक पक्ष-आर्थिक स्थिति, अनुकूल व्यवसाय, प्रेम और वैवाहिक सुख, मैत्री राशि आदि

धनु लग्न राशि से काल पुरुष की नवमी राशि उच्च लक्ष्य साधे धनुर्धारी पुरुष तथा कटी भाग से नीचे अर्ध अश्व की आकृति ग्रहण की हुई राशि मानी जाती है। इस प्रकार धनु जातक वाले यदि योग साधना के बल पर पाशविक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लें तो वह ध्यान और योग की उच्च स्थितियों को प्राप्त कर सकते हैं।

आर्थिक स्थिति👉 धनु लग्न के जातक उच्च अभिलाषी, परिश्रमी एवं बौद्धिक क्षेत्र में विशेष योग्यता होने से अपने कार्य व्यवसाय में विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेते हैं। चाहे निजी व्यवसाय में हो अथवा सर्विस में हो दोनों स्थितियों में वह किफायत एवं समझ कर खर्च करने वाले होते हैं। धनु राशि की कुंडली में यदि सूर्य, गुरु, शनि एवं बुध ग्रह शुभ हो तथा ग्रह दशा भी इन्हीं ग्रहों में से किसी की हो तो जातक की आर्थिक स्थिति विशेषकर (40 वर्ष की आयु के बाद) अच्छी होती है। तथा अपने परिवार के लिए उदार पूर्वक व्यय करते हैं।
प्रारंभिक जीवन में अब जीविकोपार्जन के साधन चाहे अल्प रहे हो किंतु धनु जातक अपने पुरुषार्थ एवं शुभ ग्रहों के प्रभाव स्वरूप भूमि, जायदाद, मकान, वाहन आदि सुख के साधन बना लेता है। यदि कुंडली में केंद्र गत चंद्र-गुरु एवं बुध हो तो जातक को धन अर्जन करने में स्त्री का भी सहयोग विशेष रहता है। यदि शनि स्वक्षेत्री हो तो जातक धीरे-धीरे विपुल धन का स्वामी होता है। धनु कुंडली में केंद्र त्रिकोण में सूर्य-बुध का योग जातक को बौद्धिक कार्यों से विशेष धनलाभ करवाता है।

अनुकूल व्यवसाय👉 धनु जातक की कुंडली में यदि सूर्य, बुध एवं गुरु शुभस्थ हो तो जातक बौद्धिक कार्यों में विशेष सफल होता है। जैसे प्रोफेसर, अध्यापक, वकील, जज, ज्योतिषी, दार्शनिक, चिकित्सक, धर्मगुरु (उपदेशक), कर्मकांड पंडित, कलाकार, अभिनेता, अभिनेत्री, व्यापारी, खिलाड़ी, करियाना या जनरल स्टोर, समाज सेवक या राजनीतिज्ञ, बैंकिंग गुप्त चर, अकाउंटेंट, मैनेजर, संपादक, प्रकाशक होता है। यदि कुंडली में चंद्र-शुक्र आदि भी शुभस्थ हो तो जातक-जातिका अभिनय, नृत्य, गायन, फैशन डिजाइनिंग, सौंदर्य प्रसाधन, आदि के क्षेत्र में विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त करते हैं। धनु जातक की कुंडली में शनि दूसरे भाव में स्वक्षेत्रीय हो तो जातक उच्च स्तरीय उद्योग अथवा उच्च स्तरीय व्यवसाय में सफल होता है। ऐसे जातक शिल्प, क्रय-विक्रय, कंप्यूटर विशेषज्ञ, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों में भी विशेष उन्नत एवं लाभान्वित होते देखे गए हैं।

प्रेम और वैवाहिक सुख👉 प्रेम और विवाह के संबंध में धनु जातक अत्यंत संवेदनशील मैत्रीपूर्ण एवं उदाहरण होते हैं। अपने उत्साहशील, आशावादी एवं विवेकपूर्ण व खुले व्यवहार तथा सहज मधुर मुस्कान लिए धनु जातक विपरीत सेक्स के युवक-युवतियों के लिए शीघ्र आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। धनु जातक जीवन में आदर्श प्रेम और बलिदान को विशेष महत्व देते हैं। प्रेम के वशीभूत होकर वह निजी स्वार्थ का भी बलिदान कर देते हैं। परंतु धनु द्विस्वभाव राशि होने के कारण ऐसे जातक प्रेम के प्रसंगों में भी जल्दबाजी नहीं करते अपितु खूब सोच विचार एवं उहापोह के उपरांत किसी के प्रेम में समर्पित हो पाते हैं। परंतु जब किसी से करने लगते है तो प्रेम एवं मैत्री में वह पूरी ईमानदारी उत्साह एवं गहराई से स्वयं को न्योछावर कर देते हैं। विवाह संबंधों के बारे में भी धनु जातक शीघ्रता एवं अत्यंत भावुकता से काम नहीं लेते बल्कि गंभीर चिंतन एवं सोच-विचार के बाद ही जीवन साथी का चुनाव कर पाते हैं। इसी असमंजस पूर्ण प्रकृति के कारण कई बार जातक की विवाह की उपयुक्त आयु भी निकल जाती है। यदि जातक की कुंडली में गुरु, सूर्य, बुध एवं शुक्र शुभस्थ हो तो जातक का वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। पत्नी सुशील, बुद्धिमान तथा आर्थिक क्षेत्र में भी सहयोगिणी होती है। यदि कुंडली में सप्तम भाव में राहु ग्रह हो तथा बुध-शुक्र अशुभ हो तो दाम्पत्य जीवन असुखद तथा पत्नी रोगिणी एवं विरुद्ध स्वभाव की होगी।

सावधानी👉 गृहस्थ एवं सामाजिक जीवन में सफलता के लिए अधिक क्रोध, ज़िद एवं आलोचनात्मक (नुक्ता चीनी) के स्वभाव पर यथासंभव नियंत्रण रखने का प्रयास करें। धनु लग्न जातक की पत्नी को भी पति के क्षणिक क्रोध की उपेक्षा करके धैर्य एवं शांति का परिचय देना चाहिए।

अनुकूल राशि मैत्री👉 धनु राशि लग्न जातक को प्रायः मेष, मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुंभ और मीन लग्न राशि के जातकों के साथ विवाह, व्यापार आदि संबंध लाभप्रद होंगे। कर्क, धनु और मकर राशि वालों के साथ सामान्य तथा वृषभ और वृश्चिक, मकर राशि वालों के साथ संबंध लाभप्रद नहीं होंगे। विवाह में तात्विक एवं राशि मैत्री के अतिरिक्त पारस्परिक कुंडली मिलान मांगलिक आदि विचार तथा गुण मिलान का भी विचार अवश्य कर लेना चाहिए।

धनु लग्न की कन्या (जातिकाये)

धनु लग्न (राशि) की कन्या कुछ लंबे कद की सुंदर, सुगठित एवं संतुलित शरीर, अंडाकार चौड़ाई लिए लंबा चेहरा, कुछ गेहूंआ वर्ण, चमकदार बड़ी (बादामी) आंखें, गहन घनी भौहे, सुंदर मजबूत दांत, कुछ चौड़ा मस्तक, खूबसूरत सुंदर एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाली होती है।

स्वभावगत विशेषताये👉
चापोदये या वनिताभिजाता सा बुद्धिशूरा बहुकला कुशला।
पुण्यकर्मरता, धर्मशीला, धन, पुत्रवती जाता पति-सुखान्विता।।

अर्थात धनु लग्न में उत्पन्न जातिका अत्यंत बुद्धिमान, गायन, संगीत, साहित्य, नृत्य, अभिनय आदि कला में कुशल। परोपकारी, दया-दान आदि पुण्य कर्मों में रुचि रखने वाली। धनवान, श्रेष्ठ पति एवं संतान आदि सुखों से संपन्न होती है। इसके अतिरिक्त यदि गुरु, मंगल, सूर्य शुभ हो तो धनु जातिका अध्ययनशील प्रकृति, हंसमुख, नरम दिल, उदार हृदय, ईमानदार, सत्यप्रिया, धर्मपरायणा होते हुए भी दूसरों से सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने वाली एवं स्वतंत्र चिंतन करने वाली, स्वाभिमानी, न्यायशील, साहसी, आत्मविश्वास की भावना से युक्त होती है। ये जिस काम को करने का निर्णय कर ले उसे हर स्थिति में पूरा करके ही छोड़ती है।

इन्हें अपने लक्ष्य के लिए निर्णय करने में विलंब हो सकता है परंतु जब किसी कार्य के लिए गंभीरता से निश्चय कर ले तो उसमें अवश्य सफलता प्राप्त कर लेती है। ऐसी जातिका प्राय: उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल होती है। धनु लग्न की जातिका की कुंडली में मंगल, बुध आदि ग्रह शुभस्थ हो तो जातिका उच्चाअभिलाषी, परिश्रमी एवं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्साहशील एवं सक्रिय रहती है। जातिका अभिनय, नृत्य, कास्मेटिक, ड्रेस डिजाइनिंग, कंप्यूटर डिजाइनिंग, ऑफिस क्लर्क, अध्यापक, शिक्षा, खेलकूद, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में विशेष सफल होती है।

इसके अतिरिक्त शिक्षा व्यवसाय एवं कैरियर के लिए गत पोस्ट में लिखे गए पुरुष धनु जातक के व्यवसाय संबंधी विवरण का भी अवलोकन कर सकते हैं।

मंगल, गुरु एवं बुध आदि ग्रहों के प्रभाव स्वरूप धनु जातिका गुणवती, चरित्रवान, उच्च-शिक्षा, पठन-पाठन लेखन-संपादन, आदि कार्य में विशेष रुचि रखने वाली, अपने गुणों द्वारा समाज एवं परिवार में प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाली, बौद्धिक, कलात्मक एवं रचनात्मक विषयों में विशेष रुचि रखने वाली होगी। कम पढ़ी लिखी होने पर भी धर्म एवं लोक व्यवहार के संबंध में अच्छा ज्ञान रखेगी।

स्वास्थ्य एवं रोग👉 धनु जातिका का स्वास्थ्य बाहरी तौर पर देखने से अच्छा लगता है। परंतु यदि जन्म कुंडली में चंद्र, मंगल, शुक्र ग्रह अशुभ हो अथवा छठे, सातवें एवं आठवें भाव में शनि, मंगल, चंद्र, केतु, राहु आदि क्रूर ग्रह पड़े हो तो जातिका को उदर या रक्त विकार, अनियमित मासिकधर्म, रक्तस्त्राव आदि गुप्त रोग, पथरी, गला, नजला-जुकाम, शिर या नेत्र पीड़ा संबंधित रोगों का भय रहता है।

प्रेम और दाम्पत्य सुख👉 प्रेम के संबंध में धनु जातिका व्यवहार कुशल, स्पष्टवादी, सहृदया एवं सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करने वाली। मधुर मुस्कान, स्वच्छंद व्यवहार एवं आकर्षक व्यक्तित्व के कारण धनु जातिका अपना काम करवाने में कुशल होती है। प्रेम प्रसंगों में भी भावुकतावश बहुत जल्दबाजी नहीं करती बल्कि गहन सोच विचार के बाद ही विपरीत योनि के प्रति प्रेम भावना प्रकट करती है। परंतु अपने स्वाभिमान और आदर्शों के विरुद्ध समझौता नहीं करती। यदि कुंडली में गुरु, बुध शुभस्थ हो एवं सप्तम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो और दशा भी शुभ ग्रहों की हो तो जातिका का विवाह उच्च प्रतिष्ठित योग्य लड़के के साथ होता है। पति धन संपदा एवं सुख साधनों से संपन्न होगा तथा परस्पर दांपत्य जीवन सुखमय होगा। विवाह के बाद जातिका अपने पति के परिवार एवं आर्थिक क्षेत्र में भी विशेष सहयोगी होती है। यदि सप्तम भाव में मंगल, राहु, केतु, शनि आदि क्रूर ग्रह एवं अशुभ नवांश हो तो दांपत्य सुख में कमी होती है।

अनुकूल मैत्री राशियां👉 धनु लग्न राशि की जातिका बौद्धिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक क्षेत्र में अपने से श्रेष्ठतर जीवन साथी को अधिमान (प्राथमिकता) देती हैं। जातिका का मैत्री एवं विवाह संबंध प्राय मेष, मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुंभ, मीन लग्न राशियों के साथ शुभ एवं लाभदायक होगा। कर्क, धनु और मकर लग्न वाली राशियों के साथ मध्यम फलदाई तथा वृष, वृश्चिक लग्न राशि वाले जातक के साथ अशुभ फलदायक रहने की संभावना होगी। फिर भी परस्पर जन्मपत्रिका मिलान करके विवाह संबंध करना शुभ एवं कल्याणकारी रहता है।

सावधानी👉 धनु लग्न राशि की जातिका को जीवनसाथी चुनाव करते समय बहुत अधिक तर्क-वितर्क, उहापोह एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण नहीं रखना चाहिए। कई बार वृथा हठधर्मी के कारण मांगलिक विवाह की उपयुक्त आयु निकल जाती है तथा स्वयं तथा माता पिता एवं साथी को अनेक प्रकार की दुश्वारियो का सामना करना पड़ता है।

धनु लग्न जातक/जातिकाओ की दशा-अंतर्दशा में ग्रहों के फल एवं अन्य शुभाशुभ ज्ञान

किसी भाव संबंधी फलादेश ज्ञात करने के लिए ग्रहों की दशा, अंतर्दशा, प्रत्यंतर दशा तथा गोचर ग्रहों की शुभ अशुभ स्थिति को भी ध्यान में रखना होता है। सभी ग्रह अपनी दशा-अंतर्दशा आदि के काल में कुंडली में स्थिति अनुसार अपना शुभाशुभ फल प्रदान करते हैं। ग्रहों की दशा अंतर्दशा के फलादेश का निर्णय करने से पूर्व ग्रहों के कारकत्त्व स्थान आदि बल वक्री-मार्गी, उच्च-नीच आदि अवस्थाओं को भी ध्यान में रखना उचित होगा। प्रत्येक लग्न में ग्रह दशा फल में भिन्नता आने की संभावना होती है। शुभ एवं उदित ग्रह अपनी दशा-अंतर्दशा में धन, वाहन, भूमि, विवाह, संतान, विद्या आदि सुखों की प्राप्ति तथा सोची हुई योजनाओं में सफलता प्राप्त करवाता है।

जबकि अशुभ भावस्थ एवं नीच शत्रु राशि गत, पापी ग्रह अपनी दशा में धन हानि, शत्रु एवं रोग पीड़ा, प्रिय जनों से अनबन, कलेश व बनते कार्यों में अड़चनें पैदा करता है। धनु लग्न जातक की कुंडली में सूर्य, बुध, गुरु, मंगल ग्रह का शुभ फल अन्य ग्रह चंद्र, शुक्र व शनि का शुभाशुभ अर्थात मिश्रित फल प्रदान करेंगे। राहु, केतु कुंडली में स्थिति के अनुसार फल करेंगे इस संबंध में हमारे द्वारा पूर्व में प्रेषित किये लेख “धनु लग्न में शुभाशुभ एवं योगकारक ग्रह” शीर्षक के अंतर्गत लिखे विवरण का भी अध्ययन करना चाहिए।

धनु लग्न संबंधित कुछ उपयोगी उपाय👉

शुभ रंग👉 पीला, गुलाबी, हल्का हरा, सतरंगी, हल्का नीला।

अशुभ रंग👉 काला, लाल, गहरा हरा

शुभ वार👉 रविवार, बुधवार, वीरवार, शुक्रवार तथा शनिवार।

भाग्यशाली नग👉 माणक तथा पुखराज दोनों में से कोई एक नग (ग्रह दशा एवं आवश्यकता अनुसार) सोने या ताम्र स्वर्ण मिश्रित अंगूठी में क्रमशः रविवार अथवा गुरुवार को विधिपूर्वक धारण करें। नग सहित अंगूठी पर तीन माला बीज मंत्र का पाठ करके शुद्ध करके शुभ मुहूर्त में धारण करें।

सूर्य बीज मंत्र ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नमः।

गुरु बीज मंत्र👉 ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स:गुरवे नमः।

वीरवार का व्रत विधि पूर्वक रखना तथा उस दिन एक बार मिष्ठान युक्त भोजन करना तथा गाय को हरा चारा एवं गुड सहित चपातीया डालना शुभ होगा।

शुभ अंक👉 1, 3, 5 व 9 के अंक क्रमानुसार शुभ एवं भाग्यकारक होते हैं।

भाग्योन्नति कारक वर्ष👉 32वां 36, 37 39, 41 एवं 45 वां 47 वां और 50 वां वर्ष शुभ एवं भाग्य उन्नति कारक होगा।

अगले लेख में हम मकर राशि एवं लग्न का अनुभव आधारित संबंधित विस्तृत लेख प्रेषित करेंगे।

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