जानिये पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से रोग (बीमारी) में ज्योतिष, भाग्य और आयुर्वेद की भूमिका, परिचय (दृष्टांत)…..

धर्म डेक्स। जानिये पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से रोग (बीमारी) में ज्योतिष, भाग्य और आयुर्वेद की भूमिका, परिचय (दृष्टांत)…..



लेख लंबा है लेकिन आज विज्ञान को मानने वाले अधिसंख्यक बुद्द्धिजीवी लोग विज्ञान के ही एक प्रामाणिक अंग ज्योतिष शास्त्र के प्रति उदासीन हैं तथा वे ज्योतिष विज्ञान की सार्थकता को समझने व इसकी उपयोगिता को व्यवहार में लाने के लिए रुचि ही नहीं लेते उनके लिये यह लेख रोग आदि में ज्योतिष की महत्त्वपूर्णभूमिका के विषय मे सोच बदल सकता है।

ट्रिंटो कालेज में पढ़े सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक सर न्यूटन एक कुशल ज्योतिषी थे ।
उन्होंने पृथ्वी के आकर्षण सिद्धांत को समझने के लिए भारतीय ज्योतिष शास्त्र का सहारा लिया था। वे अक्सर ज्योतिष की पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते तल्लीन हो जाते थे।
उनके एक वैज्ञानिक मित्र ने एक दिन झल्लाकर पूछा- Why do you belive in astrology? सर न्यूटन ने विनम्रता से जवाब दिया-‘Because I have gone
through it and you have not.’ प्राय: ज्योतिष विज्ञान की निंदा प्रमुखत: वे ही
लोग किया करते हैं, जिनको इस शास्त्र के बारे में अ, ब, स का भी ज्ञान नहीं होता ।
औषधियों पर पड़ने वाले ग्रहों के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए वैदिक ऋषि कहते

‘सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथ्वी मही ।’
‘अधो नक्षत्राणामेषामुपत्ये सोम आहित: ।।
-ऋ0 10/75/2

फलित ज्योतिष के अस्तित्व को सर्वथा न मानने वाले, ज्योतिष के कट्टर विरोधी
स्वयं महर्षि दयानंद ‘ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका’ में इसी मंत्र द्वारा चंद्र-ग्रह की रश्मियों के प्रभाव को स्वीकार करते हुए लिखते हैं-‘चंद्रमा के प्रकाश और वायु से सोमलता आदि औषधियाँ पुष्ट होती हैं और उनसे पृथ्वी पुष्ट होती है इसीलिए ईश्वर ने नक्षत्र लोकों के समीप चंद्रमा स्थापित किया है।”

भारतीय ज्योतिषियों ने खोज की और पाया कि संपूर्ण वर्ष भर में चंद्रमा शरद
पूर्णिमा को पूर्ण कलाओं के साथ उदित होता है। उस दिन परिपक्व पूर्णेन्दु की किरण पुंजों में एक विशेष प्रकार की शक्ति छिपी होती है । फलत: उस रात्रि में चंद्र किरण ने माध्यम से दमा व नाना प्रकार की दुःसाध्य बीमारियों के निराकरण हेतु विश्व के कोने-कोने में औषधियाँ बनाई जाती हैं।
कुमुद पुष्प का चंद्र किरण से खिलना बड़ा मायने रखता है। रात्रि में खिलना एक गौण बात है परंतु चंद्रमा की किरणों में छिपे हुए इलेक्ट्रोन कुमुद पुष्प की पंखडियों को किल्लोरत कर उसे खिलने के लिए बाध्य कर देते हैं। यह चंद्रमा की रश्मि-पंजों का कुमुद पुष्प पर प्रत्यक्ष प्रमाण है। वैज्ञानिकों ने समुद्र में ज्वारभाटा का कारण चंद्रमा को ही माना है तथा यह तथ्य हाथ लगा कि अमावस्या और पूर्णिमा को ‘फाइलेरिया (रोग विशेष) की वृद्धि में चंद्रगणा
का मुख्य हाथ है। अंक गणना से पता चलता है कि पूर्णिमा की रात्रि को इतने ज्यादा बलात्कार व पागलपन के दौरे पाए जाते हैं जितने पूरे वर्ष भर संभव नहीं हैं।
ज्योतिष और चिकित्सा विज्ञान की तुलना की जाए तो आप आश्चर्य करेंगे। सारा चिकित्सा विज्ञान ज्योतिष पर अवलंबित है। औरतों के मासिक धर्म पूर्णतः चंद्र
स्थितियों पर निर्भर होते हैं । स्वीडन के वैज्ञानिक डॉ० स्वांतो आर्थनियम ने पूरे आंकड़े देते हुए स्पष्ट किया कि औरतों का मासिक धर्म उस समय होता है जब चंद्रमा पर मंगल का अतिक्रमण होता है। अर्थात् जब चंद्रमा मंगल से चौथे स्थान में आता है तब-तब औरतें मासिक धर्म में आ जाती हैं। जब-जब सूर्य उन्तप्त होता है हमारी रक्त धाराएं बदल जाती हैं । सूर्य की गति व रुख के अनुसार सूर्यमुखी पुष्प में परिवर्तन आता है। जिधर सूर्य घूमता है उधर वह सीधा घूम जाता है।

वैज्ञानिकों ने खोज की और पाया कि चाहे जितने ही बंद कमरे में क्यों न हों, दिन
के समय जन्मे सभी बच्चों का आई कोर्निया (Eye cornia) भूरे रंग का होता है, यदि इन बच्चों का जन्म रात्रिकाल में हो तो आई कोर्निया (Eye cornia) कृष्ण व नील वर्ण का होता है । शुक्ल पक्ष में जन्मे बच्चे का नेत्रपटल (Eye space) एकदम श्वेत होता है। कृष्ण पक्ष में जन्मे बच्चे का नेत्रपटल (Eye space) कुछ पीलापन लिए होता है। कर्क के चंद्रमा में जन्मे सभी बच्चों की दंतावली एक श्वेत दूधिया व मोतियों के समान चमकीली होती है। इसके विपरीत वृश्चिक के चंद्रमा में जन्मे बच्चों के दांत सदैव रोगीले, पीले व पायरिया से ग्रसित होते हैं। वैज्ञानिक प्रगति में अग्रगण्य माने जाने वाले देश रूस के वैज्ञानिक डॉ०
निकोलस रोगियों के रोग निदान के समय पर जड़ी-बूटी छाँटने के लिए ज्योतिष चार्ट
हमेशा पास रखते हैं। ज्योतिष चिकित्सा की दृष्टि से डॉ० एच० एल० कोनेल की
Encyclopedia of Medical Astrology तथा अमेरिका सरकार से प्रकाशित Astro-Medical Dictionary नामक ग्रंथ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं । विश्व के महान् वैज्ञानिक व मनोचिकित्सक डॉ० जुंग का कहना है कि ‘ज्योतिष का ज्ञान, रोग निदान में बहुत बड़ा सहायक है। जो इस दिव्य ज्ञान से वंचित हैं वे वस्तुत: ईश्वर प्रदत्त प्राकृतिक संकेतों के बृहद् ज्ञानराशि से वंचित हैं।’ डॉ० जुंग अपने रोगियों के सही इलाज पर पहुँचने के लिए रोगियों की जन्म कुंडली पर विचार किया करते हैं।
प्रचलित चिकित्सा पद्धति में ऐलोपैथिक (पाश्चात्य-चिंकित्सा) होम्योपैथी,
आयुर्वेदिक, यूनानी व प्राकृतिक चिकित्सा मुख्य रूप से प्रचलित हैं । ऐलोपैथी
कीटाणुओं (Germs) से रोगों की उत्पत्ति मानता है, इसके निदान हेतु वह भिन्न-भिन्न
प्रकार के इंजेक्शन, टैंबलेट व कैपसूल का प्रयोग करता है। आयुर्वेद वात्त, पित्त व कफ की विषमतावस्था से रोगों की उत्पत्ति मानता है तथा रोगों के निदान हेतु वह भिन्न-भिन्न वनस्पतियों की जड़ी-बूटियों एवं धातुओं का प्रयोग करता है। यूनानी चिकित्सा में क्वाथ व जवाहरात की भस्मों का प्रयोग किया जाता है । होम्योपैथी दवा के सुक्ष्मता मान को मान्यता देती है। इसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सक (Naturopethy) पंचभूत शरीर के पंचतत्व को लेकर सूर्य, चंद्र-रश्मियों, मिट्टी व उपवास से रोगों का निदान करता है। परंतु ज्योतिष में रोगों की उत्पत्ति और उसके निदान का तरीका इन सबसे अलग व विलक्षण है ।

ज्योतिष रोग को जड़ से पकड़ता है । रोगों व व्याधियों के संबंध में ज्योतिष की पहुंच बहुत गहरी और गंभीर है, जहाँ अभी तक आधुनिक चिकित्सा शास्त्र को पहुँचने
में हजारों वर्ष लगेंगे। ज्योतिष रोग को कर्मज मानता है। ज्योतिष शास्त्र की यह
मान्यता है-‘पूर्वजन्मकतं पांप व्याधिरूपेण बाधिता’ पूर्वजन्म के पास इस जन्म में
बीमारी, घाव व रोग के रूप में प्रकट होते हैं। ज्योतिष का कहना है कि सभी प्रकार की व्याधियों , रोग, दुःख एवं कष्ट कर्मज होते हैं। ज्योतिष श्राप, वरदान, आशीर्वाद एवं प्रार्थनाओं की अदृश्य शक्तियों को मान्यता देता है तथा जप, तप यम-नियम, दान-पुण्य एवं प्रायश्चित के द्वारा उन-उन रोगों का शमन करता है।

ज्योतिष की यह मान्यता है कि चिकित्साएं एक सीमा तक ही रोग का इलाज कर
सकती हैं । उसकी मान्यता है कि औषधियां यदि रोगी को ठीक करने में निर्णायक होतीं तो किसी व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती। मृत्यु अनिवार्य है और उसका इलाज किसी डाक्टर, वैद्य या हकीम के पास नहीं है । दैनिक जीवन में हम देखते हैं डा० कहता है-आपरेशन सक्सेसफुल’ और तत्काल रोगी की मृत्यु हो जाती है। एक तरफ हमदेखते हैं कि एक व्यक्ति सदाचारी जीवन जी रहा है, स्वच्छ रहता है, दूसरों के हाथ का खाना नहीं खाता, उबला हुआ पानी पीता है फिर भी उसे श्वेत कुष्ठ कैंसर एवं जालंधर जैसे भयंकर रोग हो जाते हैं जिनका इलाज भी संभव नहीं । ज्योतिष कहता है ‘कालोजगत्भक्षकः’ यह काल (समय) विशेष ही है जो व्यक्ति को बीमार करता है व उसे मार डालता है, यह सारा संसार उस काल (समय विशेष) के अधीन है । केवल कुशल ज्योतिषी ही उस काल पुरुष की गणना कर उसे समझने की सामर्थ्य रखता है।

कथा प्रसिद्ध है कि एक साधु आयुर्वेद का जानकार था। उसके शरीर में क फोड़ा हो गया। साधु ने उस पर मरहम-पट्टी की परंतु घाव ठीक होने के बजाए और बढ़ गया। सांधु सावधान हो गया। उसने बड़ी सावधानी से विधिपूर्वक घाव के चिकित्सा की, परंतु सारे उपाय व्यर्थ हो गए । घाव ठीक होने के विपरीत बढ़ता ही चला गया। साधु परेशान हो गया उसने घाव की चिकित्सा करनी छोड़ दी और सोचा-यह पूर्व जन्म का कोई पाप है। जो व्याधि (घाव) के रूप में प्रकट हुआ है। अत: यह दवा से नहीं, ईश्वर की इच्छा व कृपा से ठीक होगा। शास्त्र कहते हैं-

‘औषधी मणिमन्त्राणा, ग्रह-नक्षत्र
तारिका।
भाग्यकाले भवेत्सिद्धि अभाग्यं निष्फलं भवेत् ।।’

औषध चिकित्सा, मणि व रत्न चिकित्सा तथा मंत्र चिकित्सा भी समय के अनुकूल होने पर ही काम करते हैं । कुछ समय बीता । वह साधु दोपहर को अपने आश्रम में बिल्व वृक्ष की छाया में सो रहा था । उसे आभास हुआ मानो उसे कह रहा था कि तुम मेरे फल को घोट कर पी जाओ तथा उसकी छाल को घाव पर लगा दो, तो तुम्हारा यह घाव तत्काल ठीक हा जाएगा। साधु स्वप्नवत् नोद से जागा। उसने विचार किया यह बिल्व वृक्ष सदा से यहीं पर है। मैं भी अनेक बार इसके नीचे विश्राम करता हूँ पर आज यह क्योंकर बोला । साधु विद्वान् था। वह समझ गया कि अब मेरा समय अनुकूल आ गया है, अब तो मैं बिना इलाज के भी ठीक हो सकता हूँ। यही हुआ, एक-दो दिन में ही उस साधु का वह घाव चमत्कारिक ढंग से ठीक हो गया। अत: यह सही है कि न दवाइयां व्यक्ति को ठीक करती हैं, न चिकित्सा, न औषधियाँ
व्यक्ति को मारती हैं, न डॉक्टर । रोग तो एक बहाना है, घटनाएं तो एक उपालम्भ हैं,
छलावा हैं वस्तुत: काल विशेष ही आदमी को मारता है, काल विशेष ही उसे ठीक करता है।

किसी ने सच ही कहा है कि भौतिक विज्ञान की सीमाएं जहां समाप्त हो जाती हैं ठीक वहीं से आध्यात्म विज्ञान की सीमाएं प्रारंभ हो जाती हैं । डाक्टर स्वयं जब मरीज से निराश हो जाते हैं तब मरीज के रिश्तेदारों से कहते हैं कि भगवान् से प्रार्थना करो वही इसे बचा सकता है । उस समय आधुनिक विज्ञान ज्योतिष के सामने बौन। साबित हो जाता है । उस समय लोग ज्योतिषियों के पास जाते हैं, मंदिरों में जाते हैं, जप, तप, दान व धार्मिक अनुष्ठान करते हैं तथा आप व हम सभी ने देखा व अनुभव किया होगा कि कई लोग बिना दवाई के आश्चर्यजनक रूप से ठीक हो जाते हैं

एक गाँव में एक बहुत अनुभवी एवं पारंगत वैद्य रहता था वैद्य जी ज्योतिष शास्त्र के भी ज्ञाता थे। जो भी रोगी उसके पास जाता ठीक होकर ही लौटता । वैद्य का कीर्ति पूरे गांव एवं शहर से पूरे राज्य में फैल गई । वैद्य जी वृद्ध हो चले थे उन्होंने आयुर्वेद-ग्रंथों का सहारा लेते हुए अपने जीवन भर के निचोड़ से एक “रामबाण गोली” का निर्माण किया। उस गोली की यह विशेषता थी कि एक बार के प्रयोग से वह गोली केसे भी मरणासत्र व्यक्ति में भी प्राण फूक देती थी। वैद्य जी का यश इतना फैल गया कि नगरवासियों ने उनका बड़ा भारी नागरिक अभिनंदन किया राजा के गणमान्य व्यक्तियों ने उन्हें “प्राणाचार्य” की उपाधि से विभूषित किया । वैद्य जी का जीवन बड़े आनंद व ऐश्वर्य के साथ बीत रहा था। समय बीतता चला गया एवं काल चक्र घूमा। एक दिन शहर का राजा बीमार
प्रदा । अनेक वैद्य, हकीम, लुकमान, डॉक्टरों के निरंतर उपचार से भी राजा की बीमारी ठीक न होकर बढ़ती ही जा रही थी। धीरे-धीरे राजा मरणासन्न अवस्था में पहुंच गया। ऐसे में मंत्रीगणों व शुभ चिंतकों ने वैद्य प्राणाचार्य को याद किया। प्राणाचार्य आए, राजा की धीमी गति से चलती हुई नब्ज टटोली। कुछ सोच-विचार कर प्राणाचार्य ने दो रामबाण गोली राजा को दे दी। नियम के अनुसार रामबाण औषधि में प्रयुक्त केसर-कस्तूरी व तेज-गर्म व दिव्य
औषधियों के प्रभाव से राजा की नब्ज की गति तेज होकर, राजा को चेतना आनी चाहिए थी पर यहां उल्टा हुआ। राजा की नब्ज और अधिक मंद हो गई प्राणाचार्य को हैरानी हुई, उसने कुछ सोच-विचार कर चार रामबाण गोली राजा को दे दी और नब्ज पकड़ कर बैठ गया। पर यह क्या ? राजा की नब्ज तो टूट गई । ठीक मध्य रात्रि को राजा के प्राण-पखेरू उड़ गए। वैद्य प्राणाचार्य के जीवन में यह पहली घटना थी कि उनके इलाज के दौरान किसी रोगी की मृत्यु हुई हो। उनका विमल यश कलंकित हो गया। नगर की जनता व मंत्रीगण वैद्य जी के प्रति निराश होकर आक्रोशित हो उठे । किसी शुभचिंतक ने उन्हें किले के गुप्त दरवाजे से बाहर निकाला। मध्य रात्रि की घोर अंधेरी रात में वैद्य जी ने अपने आपको निर्जन जंगल में पाया। वैद्य जी को लगा जैसे आयुर्वेद के ग्रंथों ने, उनके अनुभव ने, उनके साथ छलावा किया। निरंतर विचारों में उलझे हुए वैद्य जी कंटकाकीर्ण मार्ग पर अबाध गति से बढ़ते ही चले जा रहे थे । पसीने से सने हुए वैद्य जी को भयंकर प्यास लगी। बहुत तलाश करने पर उन्हें एक निर्जल कुआं दिखाई दिया। वैद्य जी पानी रहित कुएं को देखकर और अधिक व्यथित हो उठे । उन्होंने समझ लिया कि अब भाग्य उनके साथ नहीं है । दशाएं प्रतिकूल हैं । उन्होंने फौरन निर्णय लिया। “जिस आयुर्वेद शास्त्र की मैंने जीवन भर सेवा की आज उसी ने मुझे धोखा दिया। अत: आयुर्वेद शास्त्र झूठा है। अब भाग्य रहित इस कलंकित और कष्टपूर्ण जीवन से क्या लाभ? वैद्य जी मन ही मन आत्महत्या का दृढ़ निश्चय कर, उस अंधे कुएं में छलांग लगाने को उछले । इतने में पीछे से आवाज आई – “रुको ! प्राणाचार्य रुको ।” प्राणाचार्य ने पीछे मुड़ कर देखा, उस अंधेरी रात के वीराने में एक अंजान तेजस्वी युवक को देखकर वैद्य जी हतप्रभ रह गए । युवक ने वैद्य जी के मनोभावों को पढ़ते हुए कहा-“जैसा आप सोच रहे हैं वो गलत है, न तो आयुर्वेद झूठा है, न ही आपका अनुभव झूठा है। आप द्वारा किया जा रहा आत्महत्या का प्रयास कायरता के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है क्योंकि आपने मुझे नहीं पहचाना। यदि पहचान लेते तो ऐसा कभी नहीं सोचते ।”

वैद्य जी को तो जैसे लकवा मार गया। वे अपनी स्मृति-शक्ति पर जोर देते हरा उस युवक को पहचानने की कोशिश करने लगे। युवक मुस्कुराया। उसने अपनी बंद मुट्ठी खोली और वैद्य जी को दिखाते हुए कहा- “आप इसे तो अवश्य पहचानते होंगे”। वैद्य जी ने देखा ये तो वही छः रामबाण गोलियां थीं जो राजा को मरते समय वैद्य जी ने अपने हाथ से दी थीं। वैद्य जी चकराए ! बोले-” हे देव पुरुष ! आप कौन हैं?” इस बार युवक जोर से हंसकर बोला- “हे वैद्यराज ! मुझे पहचानों मैं काल हूँ ।
सारी सृष्टि मुझ से संचालित है । मैं ही समय आने पर प्राणियों को मोक्ष प्रदान करता हूं । सब संसार मुझे जानता है फिर भी मैं सबके लिए अंजान हूं। हे वैद्यराज आयुर्वेद शास्त्र सच्चा है, तुम्हारा अनुभव भी सच्चा है पर ये रामबाण गोली तो मैंने राजा के गले के नीचे नहीं उतरने दी। हे वैद्यराज। उपचार रोग का होता है, मृत्यु का नहीं । राजा की मृत्यु आ गई थी।” अत: कुशल चिकित्सक को रोग के अतिरिक्त काल की परीक्षा भी करनी चाहिए। काल विज्ञान ही ग्रह विज्ञान है । ग्रह विज्ञान ही ज्योतिर्विज्ञान है । अत: ज्योतिष को काल से, काल को ज्योतिष से अलग करना कठिन है । एक अनुभवी दैवज्ञ ही काल
की परीक्षा कर सकता है। अत: एक कुशल डॉक्टर, चिकित्सक एवं वैद्य को दैवज्ञ बनने
का प्रयत्न करना चाहिए। भौतिक शल्य-चिकित्सा व उपचार के साथ आध्यात्मिक उपचार, ग्रह-शांति यज्ञ, जप-जाप एवं प्रार्थनाओं का प्रयोग भी करना चाहिए। तभी रोगी के त्रिविध ताप (आधिदैविका, आधिभौतिक,आध्यात्मिक दोष) की निवृति होगी। रोगीं को आत्मिक शांति का अनुभव होगा एवं रोग जड़ से समाप्त होगा। आयुर्वेद का एक अतिप्राचीन मूल्यवान ग्रंथ है-‘माधवनिदान’। इस ग्रंथ में
दिया गया कि अमुक जड़ी-बूटी को अमुक दिन, अमुक नक्षत्र में तोड़ें तो उसके
गुण-धर्म बदल जाते हैं। विषरोगनिदान में बताया गया कि भरंणी, आर्द्रा, आश्लेषा
मघा, मूल व कृतिका नक्षत्रों में यदि सर्पदशं हो तो वह सर्प ने नहीं काल ने काटा है ।
कुशल वैद्य को ऐसे रोगी की चिकित्सा नहीं करनी चाहिए क्योंकि रोग का तोइलाज हो सकता है पर मृत्यु का इलाज नहीं होता। ‘मानसागरी’ में भी ऐसे अनेकों ज्योतिष के सूत्र मिलते हैं जिसमें कहा गया है कि इन तिथियों व नक्षत्रों में यदि मनुष्य को
अमुक रोग हो जाए तो साक्षात शंकर एवं ब्रह्मा, विष्णु भी उस रोगी की रक्षा नहीं
कर सकते । इन सब दृष्टांतों से यह प्रमाणित हो जाता है कि एक कुशल वैद्य, चिकित्सक व यशस्वी डाक्टर को ज्योतिष का भी ज्ञान अनिवार्य रूप से होना चाहिए, तभी उनका ज्ञान वास्तव में सार्थकता व सिद्धता को प्राप्त करेगा ।

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