जानिये पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से जन्मकुंडली में राहुमहादशा अंतर्गत अंतर्दशा का महत्व एवं फल……..

धर्म डेक्स । जानिये पंडित वीर विक्रम नारायण पांडेय जी से जन्मकुंडली में राहुमहादशा अंतर्गत अंतर्दशा का महत्व एवं फल……..

महादशा परिचय

कुंडली में एक ग्रहों की समय सारिणी होती है जिसमे लिखा रहता है कि कौन सा ग्रह कब तक आप के जीवन में प्रभावी रहेगा ग्रहों का मुख्य प्रभाव काल महादशा और उसके बाद अन्तर्दशा फिर प्रत्यंतर दशा कहलाता है। हर ग्रह की अपनी अवधि अपना समय होता है जिसके अंतर्गत जातक का जीवन चलता है क्रमानुसार ग्रहों की दशा और प्रभाव काल इस प्रकार है।

सूर्य 6 वर्ष,
चन्द्र 10 वर्ष,
मंगल 7 वर्ष,
राहू 18 वर्ष,
गुरु 16 वर्ष,
शनि 19 वर्ष,
बुध 17 वर्ष,
केतु 7 वर्ष,
शुक्र 20 वर्ष

महादशा में अन्तर्दशा……

यह सारिणी विंशोत्तरी महादशा के नाम से कुंडली में दी होती है। अब बात करते हैं महादशा के समय की। महादशा सबसे कम सूर्य की छः वर्ष होती है। शुक्र की महादशा बीस वर्ष चलती है। मैं अपने अनुभव के आधार पर बता रहा हूँ कि महादशा किसी भी ग्रह की हो परन्तु जब भी समाप्त होती है तब आपके जीवन में बड़े बदलाव आते हैं। महादशा का समाप्ति काल हमेशा कुछ न कुछ देकर जाता है।

महादशा में क्या होता है…….

महादशा के अंत में कोई न कोई उपलब्धि आपको जीवन में अवश्य होगी कोई ग्रह चाहे उच्च का हो या नीच का, मित्र राशि में हो या शत्रु राशि में अपनी राशि में हो या अस्त अशुभ हो या शुभ अपनी महादशा के समय में पूरी तरह से बुरा या अच्छा फल नहीं देता.एक ही ग्रह एक ही समय में शुभ और अशुभ दोनों तरह के फल दे सकता है इसका कारण यह है कि महादशा में अन्य ग्रहों की भी दशा होती है जिसे अन्तर्दशा कहा जाता है जिस ग्रह की महादशा होती है उस ग्रह के समय में अन्य सभी ग्रहों की अन्तर्दशा चलती है। इस तरह प्रत्येक ग्रह का प्रभाव जातक पर पड़ता है।

महादशा के दौरान व्यक्ति जो काम करता है अगली महादशा में उस काम में बदलाव आते हैं। इस तरह समय सदा एक सा नहीं रहता यह कहावत सत्य प्रतीत होती है। यदि महादशा का ग्रह यदि कोई पाप ग्रह है तो अशुभ घटनाएं और शुभ ग्रह है तो मांगलिक कार्य जीवन में सम्पन्न होते हैं। इसी तरह अशुभ ग्रह की महादशा में अशुभ ग्रह की अन्तर्दशा आने पर समय भी कठिनता से गुजरता है। नीचे दिए गए चित्र में राहू की महादशा में केतु, मंगल और शनि को पाप ग्रह में पाप ग्रह की अन्तर्दशा के रूप में दर्शाया गया है। इस जातक की राहू महादशा केतु अन्तर्दशा में पैर पर चोट लगी जो दस महीने बाद ठीक हुई। शनि की महादशा में माँ और चाचा की मृत्यु का समाचार मिला और मंगल की दशा में प्रापर्टी का नुक्सान हुआ।

केवल एक समय सारिणी यह बताती है कि कोई घटना कब होगी। आपके जीवन के प्रारम्भ से लेकर एक सौ बीस वर्ष तक चलने वाली महादशा में आप अपने भूत काल की तारीखों और जीवन की घटनाओं का अवलोकन करने के बाद यह पता लगा सकते हैं कि कब क्या किस ग्रह के कारण हुआ था और इसी तरह भविष में कब क्या होगा इसका एक मोटा अनुमान लगा सकते हैं। हर ज्योतिषी इसी सारिणी की मदद से आपके भविष्य में होने वाली घटनाओं का पता लगाता है। इसीलिए इस सारिणी को इतना महत्व दिया गया है। इस तरह जो काम आप किसी ज्योतिषी से करने की अपेक्षा रखते हैं वह आप स्वयं भी जान सकते हैं।

अन्य ग्रहों के साथ राहुदशा का प्रभाव……

राहु – जन्मकुण्डली में राहु उच्च राशि, मित्रक्षेत्री और शुभ ग्रहों से युक्त हो तो राहू शुभ ग्रहों की अपेक्षा अतीव शुभ फल प्रदाता होता है। शुभ राहु की दशा-अन्तर्दशा में जातक आकस्मिक रूप से उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता है। बुद्धिमत्ता और विद्वता आती है, उच्चाधिकार मिलते हैं। राजनीति में प्रवेश करता है, क्रोध एवं उत्साह में वृद्धि, कार्य-व्यवसाय का फैलाव एवं अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। वृषभ, मिथुन, कर्क व वृश्चिक राशि में राहु होने पर भी शुभ फल मिलते हैं। अशुभ राहू की दशा में जातक को अग्नि, विष, सांप आदि से भय रहता है। जातक अभक्ष्य-भक्षी बनता है, मित्र वर्ग से धोखा मिलता है, स्थानच्युति, धन नाश, परिवार को कष्ट और वात रोग तथा मंदाग्नि से पीड़ित होता है।

बृहस्पति- राहु शुभ हो और इसकी महादशा में शुभ और बलवान बृहस्पति की अन्तर्दशा चल रही हो तो जातक की चित्तवृति सात्विक और बुद्धि प्रखर हो जाती है, उच्चाधिकारियों से प्रीती, स्वास्थ्य सुख, पद में उन्नति मिलती है. कार्य-व्यवसाय में प्रचुर लाभ मिलता है, दर्शनशास्त्र पढ़ने में रूचि बनती है, जातक दार्शनिक विचारधारापूर्ण लेखन कर मान-सम्मान पता है। तंत्र-मंत्र जैसे गूढ़ विषय का पण्डित बन समाज को दिशा-निर्देश करता है। जिसप्रकार शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कलाएं बढ़ती हैं, वैसे ही इस दशा में जातक के यश, धन-धान्य और कीर्ति की बढ़ोत्तरी होती है। अशुभ बृहस्पति की दशा में ज्येष्ठ भ्राता का नाश, राजकीय दण्ड मिलने की सम्भावना रहती है, गैस्ट्रिक ट्रबल, ह्रदय रोग, मन्दाग्नि आदि से पीड़ा और धन हानि होती है।

शनि- शुभ राहु की दशा में शुभ व बलवान शनि की अन्तर्दशा व्यतीत हो तो काले पशुधन व काली वस्तुओं की व्यापार से लाभ, पशु वाहन की प्राप्ति होती है समाज में और अपने वर्ग में सम्मान मिलता है पश्चिम दिशा और म्लेच्छ वर्ग विशेष लाभदायक रहता है जातक राजनीति कार्यों में पटु होता है तथा ग्रामसभा और पालिका का अध्यक्ष बनता है अशुभ शनि की अन्तर्दशा में जातक अस्थिर मति, किसी अज्ञात पीड़ा से विकल, मलीन वस्त्र धारण कर इधर-उधर भटकता है किसी परिजन की मृत्यु से मन को संताप पहुँचता है जातक आत्महनन करने की कुचेष्टा करता है सर्प-विष, शस्त्राघात का भय तथा गठिया, वात रोग से शूल, उदर व्याधि, अर्श, भगन्दर आदि रोग हो जाते हैं।

बुध- शुभ राहू की महादशा में उच्च या शुभ प्रभावी बुध की महादशा चले तो जातक उत्तम विद्या प्राप्त कर लेता है प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता मिलती है जातक की चित्तवृत्ति स्थिर और बुद्धि सात्विक हो जाती है अपने मित्रों, परिजनों से सहानुभूति बढ़ती है, आय के कई स्रोत बनते हैं, जिसके कारण आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है उच्च राशि का बुध हो तो राजकीय सेवा में उच्च पद मिलता है लेखन तथा उच्चवर्गीय लोगों से धन लाभ होता है अशुभ बुध की अन्तर्दशा में जातक घोर कष्ट पाता है, प्रत्येक कार्य में विफलता मिलती है, नौकरी में न उन्नति होती है, न अवनति राजकोप का भागी होना पड़ता है अश्लील साहित्य की रचना से अपयश मिलता है जातक असत्य भाषण करता है, देव-गुरु का निंदक, दुष्टबुद्धि, अपने कूकृत्यों से भाग्य हानि कर लेता है चर्म रोग, वात रोग, फोड़ा-फुन्सी इत्यादि से पीड़ा होती है।

केतु- राहु की महादशा में केतु की अन्तर्दशा का समय अशुभ ही होता है। कुछ एक शुभ फल जो मिलते भी हैं, वे गौण हो जाती हैं। जातक की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। नीच जनों की संगति कर दुष्कर्म करने की प्रवृत्ति होती है। आजीविका का साधन नैतिक-अनैतिक कैसा भी हो सकता है। जातक पूर्वार्जित धन को मदीरापान, वेश्यागमन और जुआ आदि व्यसनों में पड़कर समाप्त कर देता है। समाज में अपना सम्मान खो देता है। घर में कलह का वातावरण बना रहता है। उदर पूर्ति के लिए भटकना पड़ता है, निर्धनता और रोगों के कारण मार्ग में और विदेश में कष्ट भोगने पड़ते हैं। स्वजनों से विछोह हो जाता है। यदि केतु लग्न के स्वामी से युक्त या दृष्ट हो तो धन लाभ होता है, पशुधन की वृद्धि होती है। वृश्चिक राशि का केतु केंद्र अथवा त्रिकोण में हो तो शुभ फल देता है।

शुक्र- शुक्र कारक ग्रह हो, बलवान और शुभ प्रभाव में हो तो राहु महादशा में जब शुक्र का अन्तर होता है तो जातक को अनेक भोगोपभोग प्राप्त होते हैं। जातक का मन चंचल और सात्विक दोनों ही प्रकार का बन जाता है। जहां वह विलासिता का जीवन जीने की चाह रखता है, वहीं धार्मिक ग्रंथों का श्रवण, अध्ययन, स्वाध्याय तथा पूजा-अर्चना भी करता है। कामवासना प्रबल होती है, लेकिन अपनी पत्नी तक ही सीमित रहता है। विलासिता की वस्तुओं का संग्रह करता है, खेल-तमाशे आदि को भी चाव से देखता है। अशुभ शुक्र के दशा काल में जातक के सुख का नाश हो जाता है। स्वजनों से विरोध बनता है, सन्तान से संताप पहुँचता है पास-पड़ोस वालों से लड़ाई-झगड़ा, जिगर-तिल्ली में शोथ, धातु क्षय, मंदाग्नि आदि रोग हो जाते हैं। शुक्र अष्टमेश हो तो मृत्युसम कष्ट मिलता है।

सूर्य- राहु भी शुभ हो तथा सूर्य उच्च राशि, मूल त्रिकोण व स्वराशि का तथा बलवान शुभ ग्रहों से दृष्ट हों तो इनकी दशा-अन्तर्दशा में जातक का कार्य-व्यवसाय बड़े क्षेत्र में फैलता है। राजकृपा से स्वल्प सुख, धन-धान्य में वृद्धि होती है। जातक राजनीति के क्षेत्र में माना जाता है तथा कई सभाओं का प्रधान या मुखिया बनता है। पैतृक सम्पत्ति मिलती है। दान-धर्म के प्रति भी रूचि रखता है, भले ही दिखावे के लिए करे। अशुभ सूर्य की दशा में जातक के रुधिर में उष्णता बढ़ जाती है, क्रोध अधिक आता है, अकारण किसी से भी झगड़ने की इच्छा होती है, पिता को कष्ट मिलता है, व्यापार में हानि, नौकरी में उच्चाधिकारियों से विरोध के कारण अवनति, शिरोवेदना, नेत्र पीड़ा, वात रोग, गठिया, सर्वांगशूल, अर्श और रक्तातिसार जैसे रोग देह को पीड़ा देते हैं।

चन्द्रमा- राहु शुभ राशि का शुभ प्रभावी होकर तृतीय, षष्ट, एकादश, नवम व दशम में हो तथा चन्द्रमा पूर्ण बली, शुभ ग्रह युक्त व दृष्ट हो तो राहु की महादशा में जब चन्द्रमा की अन्तर्दशा चलती है तो जातक ललित कला के क्षेत्र में उन्नति करता है तथा राज्यस्तरीय सम्मान पाता है. बुद्धि स्थिर व विचार धार्मिक होते हैं. श्वेत खाद्य पदार्थों को विशेष रूप से प्राप्त कर लेता है- जैसे दूध, दही, खोया, आदि आप्तजनों के आशीर्वाद से सुखमय जीवन व्यतीत करता है। अशुभ और क्षीणबली चन्द्रमा की दशा में जातक वात के कुपित हो जाने से मानसिक एवं शारीरिक कष्ट भोगता है। भूत-पिचाश आदि से मन में भय उत्पन्न होता है। वायुजनित रोग एवं शीतज्वर से पीड़ा मिलती है। देह में जल का संचय अधिक होने से मोटापा आता है।

मंगल- जब मंगल उच्च या स्वगृही होकर केंद्र, त्रिकोण, लाभ स्थान में शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होकर स्थित हो तो राहु महादशा अपनी अन्तर्दशा में बंधू वर्ग का उत्थान तथा जातक को उनसे लाभ दिलवाती है। जातक परम उत्साही होकर शत्रु का मान मर्दन ऐसे ही कर देता है- जैसे बाज कबूतरों के झुण्ड का दोनों ग्रहों में एक शुभ और एक अशुभ हो तो नाना प्रकार की आधि-व्याधि परेशान करती हैं, कार्य में विफलता तथा स्मृति का नाश हो जाता है। दोनों ही अशुभ स्थिति में हों तो बन्धु वर्ग का नाश, पुत्र सुख में कमी, चोर, सर्प, अग्नि का भय, दुर्घटना से देह पीड़ा व समाज में तिरस्कार पता है। उदर पूर्ति के लाले पड़ जाते हैं, भींख माँगने की नौबत आ जाती है, जीवन भार लगने लगता है, आत्मघात की इच्छा होती है। मंगल अष्टमेश से सम्बन्धित हो तो मृत्यु अथवा मृत्यु सम कष्ट मिलता है।

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