व्यक्तित्व एवं कृतित्व (पुस्तक समीक्षा)
सोनभद्र। साहित्य समय की चेतना, समाज की पीड़ा और मनुष्य के अंतर्मन की यात्रा का दस्तावेज़ होता है। इसी अर्थ में ‘ज़िंदगी भी एक नदी है’ प्रख्यात साहित्यकार, समाजवादी विचारक अजय शेखर के व्यक्तित्व और कृतित्व का सजीव रेखांकन प्रस्तुत करती है। मधुरिमा साहित्य गोष्ठी के उप निदेशक आशुतोष पाण्डेय ‘मुन्ना’ के सतत प्रयास और श्रद्धेय रामनाथ शिवेंद्र के सधे हुए संपादन में प्रकाशित यह कृति, अजय शेखर की साहित्यिक यात्रा की आत्मकथा-सी प्रतीत होती है—जिसमें विचार, संवेदना और संघर्ष एक साथ प्रवाहित हैं। संपादक रामनाथ शिवेंद्र का यह कथन अत्यंत अर्थगर्भी है कि— “अजय शेखर मेरे लिए सदैव एक जटिल कविता की तरह रहे हैं—जिसे गंभीरता से समझना चाहो तो वह समझ से बाहर हो जाए और लापरवाही से समझना चाहो तो कुछ समझ में ही न आए।” यह पंक्तियाँ अजय शेखर के बहुआयामी व्यक्तित्व की सटीक व्याख्या करती हैं। 112 पृष्ठों की यह पुस्तक आकर्षक कलेवर में सुसज्जित है। प्रभावी आवरण पृष्ठ पर प्रकाशित अजय शेखर का चित्र मानो उनके अंतर्जगत में झाँकने का आमंत्रण देता है। असुविधा अक्षर घर, हर्ष नगर के नितिन सिंह का शब्द संयोजन प्रशंसनीय है, वहीं अमित द्वारा निर्मित आवरण तथा पूजा ऑफसेट, जगतपुरी (दिल्ली) का मुद्रण कार्य पुस्तक को तकनीकी दृष्टि से भी समृद्ध बनाता है।

350 रुपये मूल्य की यह कृति सामग्री की दृष्टि से पूर्णतः पैसा वसूल है। पुस्तक में उप निदेशक आशुतोष कुमार, संपादक रामनाथ शिवेंद्र, गीतकार जगदीश पंथी, हाजी फरीद खां, कवि प्रद्युम्न सहित उन सभी साहित्यकारों, पत्रकारों और लेखकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई है, जिनकी लेखनी इस संग्रह का अभिन्न अंग बनी है।वास्तव में, निराले अंदाज़ के साहित्यकार अजय शेखर की रचनाएँ चेतन मन को भीतर तक आंदोलित करती हैं। वैचारिक प्रतिबद्धता और कलात्मक संतुलन के कारण वे आज लीजेंड की श्रेणी में आ खड़े हुए हैं। उनकी कालजयी रचनाएँ वर्ष 2026 की युवा पीढ़ी के लिए भी अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। पुस्तक के पृष्ठ 62 से 112 तक संकलित अजय शेखर की समसामयिक रचनाएँ विशेष रूप से पाठकों के लिए प्रेरक और वैचारिक ऊर्जा से भरपूर हैं। वहीं पृष्ठ 11 से 61 तक जनपद के प्रतिष्ठित साहित्यकारों और लेखकों द्वारा लिखे गए अजय शेखर पर केंद्रित आलेख इस पुस्तक को बहुआयामी बनाते हैं। मधुरिमा प्रकाशन योजना के अंतर्गत प्रकाशित यह पुस्तक एक अनगढ़ किंतु सच्चे रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने की एक प्रामाणिक साहित्यिक कोशिश है। ‘ज़िंदगी भी एक नदी है’ सचमुच एक ऐसी नदी है, जिसमें उतरकर पाठक विचार, संवेदना और समय की गहराइयों से होकर गुजरता है।
समीक्षक
भोलानाथ मिश्र
पत्रकार / प्राध्यापक
सोनभद्र, उत्तर प्रदेश
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