अजब-गजब: ये है टैटू का हजारों साल पुराना तरीका

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आधुनिक टैटू, जिसे ग्रामीण बोली में गोदना कहा जाता है. वास्तव में यह बैगा जनजाति का सांस्कृतिक प्रतीक है. मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले में रहने वाले बैगा जनजाति के लोगों में गोदना प्राचीन परम्परा की तरह पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. बैगा भारत की एक प्राचीन जनजाति है, जो प्रमुख तौर पर बालाघाट और डिंडोरी जिले में पाई जाती है.

गोदना इनकी आदिम परंपरा है. पुरुष हो या महिला, सभी बड़े नाज के साथ शरीर के विभिन्न हिस्सों में काले रंग का गोदना बनवाते हैं. यह इनके आत्म सम्मान का प्रतीक है. इसको बनवाने से बैगा लड़कियों को ससुराल में विशेष विशेष सम्मान मिलता है.

गोदना गोदने वाली महिला को बदनिन कहा जाता है. ये महिलाएं अनाज या पैसे के बदले बैगाओं के शरीर पर गोदना बना देती हैं. गोदना एक विशेष प्रकार के स्याही से गोदे जाते हैं. इस स्याही को बनाने के लिए पहले काले तिलों को अच्छी तरह भुना जाता है, फिर उसे लौंदा बनाकर जलाया जाता है. जलने के बाद जो कालिख मिलती है, उससे बदनिन महिलाएं जिस्मों पर मनचाही आकृति, नाम और चिन्ह गोदती हैं.

इसमें भिलवां रस, मालवनवृक्ष या रमतिला के काजल को तेल के घोल में मिलाकर उस लेप का भी इस्तेमाल किया जाता है. करीब आठ साल की बैगा लड़कियों के शरीर में गोदना करना प्रारम्भ होता है और शादी के बाद भी ये गुदवाती रहती हैं.

बैगा स्त्री गोदना गुदवाने को अपना धर्म मानती हैं, साथ ही ऐसी स्त्रियों का समाज में मान बढ़ जाता है। गोदना प्रायः माथे, हाथ, पीठ, जांघ और छाती पर गुदवाया जाता है.

गोदना बरसात के महीने में नहीं गुदवाया जाता है, बाकी किसी भी मौसम में गोदना गुदवा सकते हैं. गोदने के बाद इसे गोबर से धोया जाता है. दो-तीन दिन बाद गोदने का घाव ठीक हो जाता है. इसको गोदने में काफी कष्ट होता है, लेकिन बैगा आदिवासी इस दर्द को हंसते-हंसते बर्दाश्त कर लेते हैं.



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